जब एक सर्प को श्रीमद्भागवत कथा ने दिलाई मुक्ति
भगवान के भक्तों का यह अटल सिद्धांत है कि उनका कभी नाश नहीं होता। श्री भक्तिवेदांत वामन गोस्वामी जी महाराज इसी परम सत्य के जीवंत उदाहरण थे। वे एक महान विद्वान और रसिक संत थे, जिनका जीवन भगवन्नाम और भागवत-कथा के प्रचार में समर्पित था।
एक बार वे कोलकाता के निकट एक गाँव में श्रीमद्भागवत कथा का सप्ताह-ज्ञानयज्ञ करने के लिए पधारे। गाँव में उत्सव का माहौल था और कथा के प्रथम दिन ही सैकड़ों की संख्या में भक्तगण व्यासपीठ के सम्मुख कथा श्रवण के लिए एकत्रित हुए। जैसे ही कथा आरंभ होने को थी, एक विशालकाय नाग वहाँ प्रकट हुआ। उसका शरीर काला और उसकी आँखें चमकदार थीं।
नाग को देखकर सभी लोग भयभीत हो गए और घबराकर इधर-उधर भागने लगे। कुछ शिष्य डरकर नाग को मारने के लिए डंडे लेकर दौड़े, पर तभी श्री वामन गोस्वामी जी ने उन्हें तुरंत रोकते हुए कहा, “रुको! इसे मत मारो। यह हमारा शत्रु नहीं, बल्कि भक्त है। इसे यहाँ आने दो।”

सभी लोग आश्चर्यचकित होकर देखते रहे। नाग बिना किसी को नुकसान पहुँचाए, धीरे-धीरे व्यासपीठ की ओर बढ़ने लगा। वह व्यासपीठ पर ऊपर चढ़ा और जहाँ श्रीमद्भागवत की पवित्र पोथी रखी थी, उसके बगल में कुंडली मारकर बैठ गया। उसकी मुद्रा में अत्यंत श्रद्धा और शांति झलक रही थी। श्री महाराज जी ने जैसे ही कथा कहना शुरू किया, वह नाग अपनी फुर्ती से शांत होकर कथा श्रवण करने लगा। कथा के विश्राम के बाद, वह नाग शांतिपूर्वक वहाँ से चला गया।
दूसरे दिन, जैसे ही कथा का समय हुआ, वह नाग ठीक उसी स्थान पर आकर बैठ गया। सात दिनों तक यह क्रम चलता रहा। नाग प्रतिदिन ठीक समय पर आता, कथा सुनता और कथा के अंत में चला जाता। उसकी इस भक्ति को देखकर लोगों का भय धीरे-धीरे श्रद्धा में बदल गया।
अंतिम दिन, जब कथा का समापन हुआ, तो एक वैष्णव पार्षद महाराज जी के सामने प्रकट हुआ और हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, मैं वही नाग हूँ जिसने सात दिनों तक कथा श्रवण की।”
उसने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “मैंने पूर्व जन्म में बहुत से पाप किए थे, जिसके कारण मैं सर्प की इस घृणित योनि में चला गया। पर मेरे माता-पिता बहुत धार्मिक थे। वे मुझे जबरदस्ती संतों की कथाओं में ले जाते थे और मुझे भगवान का नाम जपने के लिए कहते थे। यद्यपि मैं मन से नाम-जप नहीं करता था, केवल उनके कहने पर करता था, पर आज मुझे समझ आया कि उसी के पुण्य प्रभाव से मुझे इस जन्म में श्रीमद्भागवत कथा सुनने का सौभाग्य मिला।”
उसने आगे कहा, “इस कथा को सुनकर मेरी चेतना शुद्ध हो गई है और मैं इस योनि से मुक्त होकर भगवान के परमधाम को जा रहा हूँ। यह सब आपकी और श्रीमद्भागवत कथा की कृपा से ही संभव हुआ।” ऐसा कहकर वह भक्त अदृश्य हो गया।
इस घटना के माध्यम से श्री वामन गोस्वामी जी ने एक गहरा आध्यात्मिक संदेश दिया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के नवें अध्याय के ३१वें श्लोक का स्मरण कराया, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: “न मे भक्तः प्रणश्यति” अर्थात “मेरे भक्त का कभी नाश (पतन) नहीं होता।”
यह कथा हमें सिखाती है कि यदि कोई भक्त किसी अपराध के कारण अन्य योनि में भी चला जाए, तो भगवान अपने भक्तों के माध्यम से उसका उद्धार कर दिया करते हैं। इसका एक और उदाहरण भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत जी का है, जो हिरण के प्रति आसक्ति के कारण अगले जन्म में हिरण की योनि में चले गए थे। परंतु उनकी पूर्व जन्म की भक्ति के संस्कार इतने प्रबल थे कि वे अपने हिरण जन्म में भी संतों के आश्रमों के पास बैठकर कथा श्रवण करते थे। उसी के फलस्वरूप अगले जन्म में उन्हें एक पवित्र ब्राह्मण का शरीर प्राप्त हुआ।
यह कथा यह प्रमाणित करती है कि भगवान के नाम और उनके भक्तों की कृपा का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता, भले ही वह अनजाने में ही क्यों न किया गया हो।
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