श्री भक्तमाल का यह अंश हमें श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी के जीवन की एक अद्भुत घटना के बारे में बताता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और भगवान के नाम की शक्ति से किसी भी माया या छल को कैसे पराजित किया जा सकता है। आइए, इस प्रसंग को और विस्तार से जानते हैं।
एक तांत्रिक और उसका छल
पुराने समय की बात है, एक व्यक्ति था जिसे तंत्र-मंत्र का गहरा ज्ञान था। उसने अपनी तांत्रिक शक्तियों से एक प्रेत सिद्ध कर लिया था। यह प्रेत तरह-तरह के रूप बदलने में माहिर था। तांत्रिक ने उसे सिखाया था कि जब भी वह उसे बुलाए, तो उसे भगवान कृष्ण का रूप धारण करके उसके सामने आना है।
अपनी इसी सिद्धि का फायदा उठाने के लिए, उस तांत्रिक ने मथुरा के एक मेले में अपनी दुकान लगाई और एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया, जिस पर लिखा था, “मैं साक्षात् भगवान कृष्ण के दर्शन कराऊँगा।” जो भी ग्राहक आता, वह तांत्रिक कुछ मंत्र बोलता और तुरंत सामने साक्षात् कृष्ण प्रकट हो जाते। उनके सिर पर मोर मुकुट होता, शरीर का रंग मेघ के समान सांवला होता और हाथ में बांसुरी होती। धीरे-धीरे, यह बात पूरे ब्रज क्षेत्र में फैलने लगी और लोग दूर-दूर से उसके पास आने लगे।
श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी का संदेह
यह बात जब भक्त श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी तक पहुँची, तो वे भी उस तांत्रिक के पास गए और बोले, “हमें भगवान कृष्ण के दर्शन कराओ।” तांत्रिक ने अपने मंत्र बोले और सामने श्रीकृष्ण का स्वरूप प्रकट हो गया।
श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी ने दर्शन किए, लेकिन उन्हें कुछ अधूरा सा लगा। वे सोचने लगे, “जब भी भगवान के सच्चे दर्शन होते हैं, तो रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में आनंद की लहर दौड़ पड़ती है और आत्मा तृप्त हो जाती है। लेकिन यहाँ तो ऐसा कोई आनंद महसूस नहीं हो रहा।” उन्हें तुरंत यह आभास हुआ कि कोई व्यक्ति पैसा लेकर भगवान को नहीं बुला सकता और न ही भगवान इस तरह प्रकट हो सकते हैं। यह निश्चित रूप से भगवान नहीं, बल्कि कोई और है जो छल कर रहा है।
अपने इस संदेह को दूर करने के लिए, उन्होंने अपने गुरुदेव का स्मरण किया और जोर-जोर से महामंत्र का जाप करना शुरू कर दिया:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥
नाम की शक्ति से प्रेत का अंत
जैसे ही श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी ने महामंत्र का जाप करना शुरू किया, उस प्रेत का असली और भयानक स्वरूप प्रकट हो गया। वह पीड़ा से चिल्लाने लगा और अपने तांत्रिक मालिक से कहने लगा, “मेरा शरीर जल रहा है! मैं इस मंत्र की अग्नि से भस्म हो जाऊँगा! पता नहीं यह कौन सा मंत्र बोल रहा है। इस मंत्र से मेरी शक्ति क्षीण हो रही है। जल्दी इसका मंत्र जाप बंद करवाओ और इसे मेरे सामने से हटाओ।”
श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी ने उस प्रेत से कहा, “तुम शपथपूर्वक यह कहो कि तुम फिर कभी किसी को ठगने में किसी तांत्रिक की मदद नहीं करोगे और ब्रज की पवित्र भूमि को छोड़कर हमेशा के लिए चले जाओगे।”
प्रेत ने तुरंत यह प्रतिज्ञा की कि वह फिर कभी ब्रज में नहीं आएगा और न ही किसी को ठगने में किसी तांत्रिक की मदद करेगा। इसके बाद श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी वहाँ से चले गए।
यह घटना दर्शाती है कि भगवान का नाम कितना शक्तिशाली है। नाम में इतनी शक्ति होती है कि वह हर प्रकार के छल, कपट और माया का अंत कर देता है। श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी की दृढ़ता और गुरु पर उनका विश्वास हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति ही हमें सही और गलत के बीच का अंतर समझने की दृष्टि देती है।

