श्री सीतारामदास जी के चरित्र की दिव्य लीलाएँ
श्री सीतारामदास जी महाराज, जिन्हें लोग उनके शरीर पर भस्म (खाक) लगाने के कारण प्रेम से ‘खाकी बाबा’ कहते थे, एक उच्च कोटि के संत थे। उनका जीवन श्री राम नाम के जप में इतना लीन था कि योग की अनेक सिद्धियाँ उनमें स्वतः ही प्रकट हो गई थीं। उनके जीवन की ये चार विलक्षण घटनाएँ उनके अद्भुत सामर्थ्य और भगवत्कृपा को दर्शाती हैं।
१. गंगा जी का दो भागों में बँटना
एक बार कुछ विदेशी शोधकर्ता भारत आए थे। वे योगियों और संतों पर शोध कर रहे थे। उन्होंने कई जगह यात्रा की, लेकिन उन्हें अधिकतर पाखंड ही नज़र आया। वे अपनी निराशा को अपने शोध पत्रों में लिख रहे थे और भारत की आध्यात्मिक धरोहर के बारे में नकारात्मक विचार बनाने लगे थे।
घूमते-घूमते वे खाकी बाबा के पास पहुँचे। बाबा ने उन्हें देखते ही दिव्य दृष्टि से उनका अभिप्राय जान लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “भारत में आज भी अनेक सिद्ध संत और योगी हैं। तुम अपने शोध में भारत के संतों के बारे में कुछ भी उल्टा-पुल्टा मत लिखना।”
उन शोधकर्ताओं ने कहा कि उन्हें कोई वास्तविक योग सिद्धि देखने को नहीं मिली। बाबा ने कहा, “यदि तुम्हें योग की सिद्धि देखने की इच्छा है, तो मैं तुम्हें दिखाता हूँ।”
वे सभी गंगा तट पर पहुँचे। बाबा ने गंगा मैया को प्रणाम किया और उनके जल पर चलना शुरू कर दिया। वे चलते-चलते दूसरे किनारे तक पहुँचे, जैसे कि वे किसी साधारण मार्ग पर चल रहे हों। यह देखकर शोधकर्ता हक्के-बक्के रह गए। दूसरे किनारे पर पहुँचकर बाबा ने गंगा मैया से कहा, “हे माता! अब मुझे वापस जाने का रास्ता दो।” यह कहते ही गंगा जी का जल दो भागों में बँट गया और बीच में एक सूखा रास्ता बन गया, जिस पर चलकर बाबा वापस आ गए। इस चमत्कारी घटना को देखकर वे शोधकर्ता बाबा के चरणों में गिर पड़े और भारत की महान आध्यात्मिक परंपरा के प्रति श्रद्धा से भर गए।
२. बालक को जीवन दान
एक स्त्री की खाकी बाबा के चरणों में गहरी निष्ठा थी। एक दिन उसका इकलौता पुत्र बहुत बीमार हो गया। जब उसे वैद्य के पास ले जाया गया तो वैद्य ने नाड़ी देखकर कहा, “यह बालक तो अब नहीं रहा।”
दुखी होकर उस स्त्री ने अपने परिवार से कहकर मृत बालक के शरीर को खाकी बाबा के चरणों में रखवा दिया। उस समय बाबा योग निद्रा में थे। जब वे जागे, तो उन्होंने बालक के मृत शरीर को देखा। बिना कुछ कहे, वे उस बालक की छाती पर खड़े हुए और जैसे ही नीचे उतरे, एक चमत्कार हुआ। वह मृत बालक उठकर बैठ गया और बोला, “माँ, मुझे बहुत भूख लगी है। मुझे खिचड़ी खानी है।”
यह देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए और खाकी बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गए।
३. श्री जयदयाल गोयनका जी पर कृपा
एक बार प्रसिद्ध गीता प्रेस के संस्थापक श्री जयदयाल गोयनका जी ने खाकी बाबा से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न किया। उन्होंने पूछा, “कृपया मेरी मृत्यु का समय बताएँ और मृत्यु के समय भगवत्स्मृति बनी रहे, इसका साधन भी बताएँ।” बाबा ने उस समय कोई उत्तर नहीं दिया, पर गोयनका जी को विश्वास था कि उन्हें उत्तर अवश्य मिलेगा।
कुछ समय बीतने के बाद, एक दिन अचानक बाबा ने अपने शिष्य श्री नारायणदास जी से सेठ जी के लिए एक पत्र लिखवाया। पत्र में लिखा था कि “अमुक दिन, अमुक समय आपकी मृत्यु होगी। आप अब से अखंड रूप-ध्यान और नाम-जप में लग जाएँ।”
पत्र मिलते ही सेठ जी ने संसार के सभी व्यवहारों को छोड़ दिया और पूरी तरह से साधना में लीन हो गए। खाकी बाबा के बताए अनुसार, ठीक उसी दिन और उसी समय पर सेठ जी ने भगवत्स्मृति के साथ अपने प्राण त्यागकर भगवान के धाम को प्रस्थान किया। यह घटना खाकी बाबा की दिव्य अंतर्दृष्टि और वचन के सामर्थ्य का प्रमाण है।

४. रसिक संत की कृपा से सहचरी भाव की प्राप्ति
श्री रूपकला जी महाराज, जो अयोध्या के एक सिद्ध रसिक संत थे, के साथ खाकी बाबा की गहरी मित्रता थी। जब भी बाबा अयोध्या आते तो श्री रूपकला जी से अवश्य मिलते और उनसे श्री रामकथा का आनंद लेते।
एक बार वे रात्रि में वहीं रुके। आधी रात में खाकी बाबा ने सुना कि श्री रूपकला जी अत्यंत विरह में रो रहे हैं और उनके मुख से ‘हे प्रियतम! हे प्राणनाथ! हे किशोरी जू!’ जैसी आर्त वाणी निकल रही है। कुछ देर बाद जब उन्होंने फिर से यह सुना तो खाकी बाबा ने उन्हें डाँटते हुए कहा, “आप यह क्या प्रियतम और प्यारे-प्यारे कहकर रोते रहते हो?”
रूपकला जी ने प्रेम से कहा, “खाकी बाबा, जिसे यह रोग हो जाता है, वही इसकी पीड़ा को जान सकता है। मुझे तो विरह का रोग लगा है। यह अपने प्रियतम का विरह है। जब तुम्हें इसका अनुभव होगा, तभी तुम इसे जानोगे।”
खाकी बाबा ने कहा, “आपकी यह लगन आप ही रखिए, मुझे इससे कोई मतलब नहीं।”
श्री रूपकला जी जानते थे कि खाकी बाबा अभी अपने अंतरंग स्वरूप को नहीं पहचान पाए हैं और यह केवल किसी रसिक संत की कृपा से ही संभव है।
अगले दिन, प्रातः नित्य नियमों के बाद, रूपकला जी ने बाबा से कहा, “खाकी बाबा, आप अयोध्या आए हैं तो एक बार आपको श्री लक्ष्मण शरण जी महाराज का दर्शन करना चाहिए।” उनके कहने पर खाकी बाबा उन रसिक संत का दर्शन करने गए। श्री लक्ष्मण शरण जी उस समय बहुत वृद्ध थे और चारपाई पर लेटे थे।
जब सभी लोग चले गए, तो श्री लक्ष्मण शरण जी ने खाकी बाबा को अपने पास बुलाया। जैसे ही बाबा ने उनके चरणों का स्पर्श किया, एक अद्भुत घटना घटी। बाबा ने देखा कि उनके शरीर का अंग-प्रत्यंग बदल गया है और वे एक अतिसुंदर तरुणी के रूप में परिवर्तित हो गए हैं। सामने जो रसिक संत लेटे थे, वे भी एक सुंदर युवती के रूप में दिखाई दिए। कुछ ही क्षणों में वह दृश्य चला गया।
खाकी बाबा घबराकर वहाँ से भागे और सीधे रूपकला जी के पास पहुँचे। उन्होंने क्रोध में पूछा, “तुमने मुझे किसके पास भेज दिया था? किस जादू-टोने के चक्कर में डाल दिया? वह बाबा तो कोई तांत्रिक लगता है। उसके चरण छूते ही मैं एक युवती बन गया और वह बाबा भी एक युवती बन गया।”
रूपकला जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “खाकी बाबा, यह कोई जादू-टोना नहीं, आप पर श्री किशोरी जी की कृपा हुई है। आपको उस संत ने श्री किशोरी जी की सहचरियों में सम्मिलित कर लिया है। आप अपने स्वरूप को पहचानो, आप तो ‘प्रिया अली’ हो।”
उन्होंने समझाया, “आपका गुरुदेव द्वारा प्रदत्त नाम सीतारामदास है, दुनिया के लिए आप खाकी बाबा हैं, और अंतरंग उपासना में आपका नाम प्रिया अली होगा।”
इसके बाद खाकी बाबा ने धीरे-धीरे रसिक संतों का संग और सेवा करते हुए माधुर्य उपासना को प्राप्त किया। जिस दिन रासिकाचार्य श्री लक्ष्मण शरण जी ने खाकी बाबा पर यह कृपा की थी, उस तिथि को उनके शिष्य श्री नारायणदास भक्तमाल जी द्वारा ‘सिय पिय मिलन महामहोत्सव’ के रूप में मनाया जाने लगा। अधिकारी भक्तों और संतों को आज भी उनके प्रिया अली स्वरूप के दर्शन होते हैं।
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