जब भगवान के नाम-जप से पितरों को मिली परमगति
चित्रकूट की पवित्र भूमि के पास एक आश्रम में श्री श्यामदास जी नामक एक महात्मा निवास करते थे। उनका जीवन अत्यंत सादा और पवित्र था। वे सदैव भगवान के नाम-जप और भजन में लीन रहते, जिससे उनके चारों ओर एक अलौकिक शांति और दिव्यता का वातावरण बना रहता था। उनके मुखमंडल पर भक्ति की आभा और नेत्रों में गहरी करुणा झलकती थी।
एक दिन, एक युवा उनके पास आया। वह सांसारिक जीवन की व्यर्थता से थका हुआ था और उसकी आँखों में सत्य की खोज की गहरी प्यास थी। उसने अत्यंत विनम्रता से श्री श्यामदास जी के चरणों में प्रणाम किया और बोला, “महाराज, मेरा मन अब इस संसार में नहीं लगता। मुझे मुक्ति का मार्ग दिखाएँ। मैं किस तरह ईश्वर को प्राप्त कर सकता हूँ?”
श्री श्यामदास जी ने उसकी निष्ठा देखी और अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे कोई जटिल साधना या कठोर तपस्या का विधान नहीं बताया, बल्कि एक सरल और सीधा मार्ग सुझाया। उन्होंने कहा, “पुत्र, जिस भी भगवान का नाम तुम्हारे हृदय को प्रिय लगे, उसी का श्रद्धापूर्वक जप आरंभ कर दो और अपने जीवन में वैष्णव आचार-विचार को अपनाओ।”
उस युवक का हृदय श्री सीताराम जी के नाम और रूप से अत्यंत आकर्षित था। उसने उसी क्षण से ‘श्री सीताराम, श्री सीताराम’ का जप करना शुरू कर दिया। वह अपनी साधना में इतना डूब गया कि उसे खाने-पीने और संसार की सुध भी नहीं रही। उसका हृदय प्रेम और भक्ति से भर गया, और वह जप के आनंद में लीन रहने लगा।
कुछ दिनों बाद, जब वह अपनी कुटिया में जप कर रहा था, तो उसे अपने चारों ओर बहुत-सी अस्पष्ट और मधुर आवाज़ें सुनाई दीं, जो लगातार “जय हो! जय हो!” कह रही थीं। पहले तो उसने सोचा कि यह उसके मन का भ्रम है और उसने उन पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन अगले तीन-चार दिनों तक यह सिलसिला जारी रहा। अब आवाज़ें और भी स्पष्ट हो गईं, और उनमें एक और ध्वनि जुड़ गई थी: “बेटा अति सुंदर, जय हो!”
यह सुनकर युवक घबरा गया। उसे लगा कि कहीं उससे कोई भूल हो रही है, या कहीं वह किसी मानसिक रोग का शिकार तो नहीं हो गया। उसका मन शंकाओं से भर गया। वह तुरंत अपनी कुटिया से निकला और भागकर श्री श्यामदास जी के पास पहुँचा।
उसने अपने गुरु के चरणों में सिर रखकर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। “संत जी,” उसने काँपते हुए स्वर में पूछा, “क्या मुझसे कोई अपराध हो गया है, या मैं बीमार हूँ? ये आवाज़ें मुझे बहुत परेशान कर रही हैं।”
श्री श्यामदास जी ने उसकी बात सुनकर अपनी आँखें बंद कर लीं और ध्यान में बैठ गए। कुछ क्षणों बाद, उनके मुख पर एक दिव्य मुस्कान आ गई। उनकी आँखें खुशी से चमक रही थीं। उन्होंने युवक के सिर पर हाथ रखा और अत्यंत प्रेम से कहा, “पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो! तुम घबराओ नहीं, यह कोई अपराध नहीं है और न ही तुम बीमार हो।”
उन्होंने रहस्य खोलते हुए कहा, “तुम्हारे इस शरीर के और तुम्हारे पूर्व जन्मों के सभी पितृगण जो अलग-अलग योनियों में फँसे हुए थे, वे तुम्हारे द्वारा किए गए नाम-जप के पुण्य के कारण मुक्त हो रहे हैं। वे इस परम आनंद में तुम्हारी जय-जयकार कर रहे हैं।”
संत ने आगे बताया, “अभी कुछ और पितृगण शेष हैं, इसलिए तुम्हें पाँच दिनों तक उनकी आवाज़ें सुनाई देंगी, जिसके बाद वे भी मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे और यह आवाज़ें बंद हो जाएंगी।”
श्री श्यामदास जी ने समझाया कि सच्ची भक्ति और भगवान का नाम-जप न केवल स्वयं को मोक्ष दिलाता है, बल्कि इसकी शक्ति इतनी विशाल है कि यह सात पीढ़ियों तक के पितरों का उद्धार कर देती है। यह कथा हमें यह सिखाती है कि भक्ति का मार्ग सिर्फ व्यक्तिगत मुक्ति का नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा साधन है जो हमारी पूरी वंशावली को सद्गति प्रदान करता है।
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