श्री भक्तमाल – ३८: श्री श्यामानंद जी | Shri Bhaktmal Ji – 38

श्री भक्तमाल – ३८: श्री श्यामानंद जी | Shri Bhaktmal Ji – 38

गौर-कृष्ण प्रेम और ब्रज-रज की अनूठी लीलाएँ


गौड़ीय संप्रदाय में, श्री गौरसुंदर चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं और संकीर्तन के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक सिद्ध संतों का प्राकट्य हुआ है। श्री श्यामानंद प्रभु उन्हीं महान संतों में से एक थे, जिनका जीवन कृष्ण प्रेम और ब्रज के प्रति अगाध श्रद्धा को समर्पित था।

जन्म और बाल्यकाल: ‘दुखी’ से ‘श्यामानंद’ तक का सफर

श्री श्यामानंद प्रभु का जन्म सन् १५३५ ईस्वी में, चैत्र पूर्णिमा के पावन दिन, पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के धारेंदा बहादुरपुर ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्ण मंडल, छह गोपों के वंशज थे। श्यामानंद प्रभु के जन्म से पूर्व उनके सभी पुत्र-पुत्रियाँ मृत्यु को प्राप्त हो चुकी थीं। इस कारण, श्री कृष्ण मंडल ने अपने इस बालक का नाम ‘दुखी’ रख दिया, ताकि शायद यह नाम किसी बुरी नजर से बचा रहे।

परन्तु, यह बालक तो अवश्य ही कोई महान संत बनने वाला था। सभी ज्योतिषी और संत उस बालक को देखकर कहते थे कि यह अवश्य कोई महान आत्मा होगा। उसका सौंदर्य ऐसा अलौकिक था कि जो भी उसे देखता, वह देखता ही रह जाता।

धीरे-धीरे बालक दुखी बड़ा हुआ। पिता ने उसे संस्कृत और शास्त्रों के अध्ययन के लिए भेजा। उसकी तीक्ष्ण बुद्धि का यह आलम था कि कम समय में ही वह श्लोक कंठस्थ कर लेता था। विद्वान उसकी इस प्रखर बुद्धि को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। बंगाल और ओडिशा क्षेत्र में उस समय श्री गौर-नितानंद प्रभु के प्रभाव से कृष्ण प्रेम और संकीर्तन की गंगा बह रही थी। आस-पास के वैष्णवों के मुख से श्री गौरहारी और नित्यानंद प्रभु के गुणगान सुनकर, बालक दुखी के मन में भी गौरचरणों का आश्रय लेने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। उसका मन सदा श्री गौर के चरणों में ही लगा रहने लगा।

उसके पिता श्री कृष्ण मंडल स्वयं भी भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे। जब उन्होंने देखा कि बालक दुखी का मन नित्य श्री गौर-नितानंद के नाम संकीर्तन और गुणगान में ही लगा रहता है, तो उन्होंने उससे कहा, “बेटा, तुम्हें अब किसी अच्छे वैष्णव संत से मंत्र दीक्षा लेकर जीवन को सफल बनाना चाहिए।”

पिता की बात सुनकर बालक दुखी ने कहा, “मेरे गुरुदेव श्री हृदय चैतन्य प्रभु हैं, जो अम्बिका कलना में विराजते हैं। श्री गौरीदास पंडित जी उनके गुरुदेव हैं, और श्री गौरसुंदर चैतन्य प्रभु व श्री नित्यानंद प्रभु सदा उनके घर में विराजमान रहते हैं। यदि आप आज्ञा दें, तो मैं उनके पास जाकर हरिनाम का प्रसाद ग्रहण करूँ।”

पिता ने पूछा, “बेटा! वह तो बहुत दूर है, तुम वहाँ कैसे पहुँचोगे?”

बालक बोला, “पिताजी! यहां आस-पास के बहुत लोग शीघ्र ही गौड़-देश को गंगा स्नान के निमित्त जाएंगे। मैं भी उनके साथ चला जाऊँगा।”

गुरु की प्राप्ति: अम्बिका कलना की ओर

पिता ने बालक को जाने की आज्ञा दे दी। कुछ ही दिन बाद, आस-पास के लोग गौड़-देश में गंगा स्नान के लिए जाने लगे। बालक दुखी भी माता-पिता का आशीर्वाद लेकर उनके साथ चल दिया। रास्ते में नवद्वीप और शांतिपुर से होते हुए वे अम्बिका कलना पहुँचे।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने स्थानीय निवासियों से श्री गौरीदास पंडित जी के घर का पता पूछा और वहाँ आ गए। श्री गौरीदास पंडित जी के घर पर श्री गौरांग महाप्रभु के मंदिर में, बालक दुखी को श्री हृदय चैतन्य प्रभु के दर्शन हुए। उसने उनके चरणों में दंडवत प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

श्री हृदय चैतन्य प्रभु ने पूछा, “बेटा, तुम कौन हो?”

बालक दुखी ने कहा, “मैं बहुत दूर धारेंदा बहादुरपुर ग्राम से आया हूँ। मेरा जन्म छह गोपों के कुल में हुआ है। मेरे पिता का नाम श्री कृष्ण मंडल है और मेरा नाम दुखी है। आपके श्रीचरणों की सेवा मिले, इसी इच्छा से आपके पास आया हूँ। आप मुझ पर कृपा करें।”

बालक की मीठी वाणी सुनकर श्री हृदय चैतन्य प्रभु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने बालक को सेवा में अपने पास रख लिया। बालक बड़े प्रेम से गुरुदेव की सेवा करने लगा। फाल्गुनी पूर्णिमा (१५५४ ई.) के शुभ अवसर पर, गुरुदेव ने बालक दुखी को दीक्षा देने का निश्चय किया। उन्होंने बालक को श्री कृष्ण मंत्र का प्रसाद प्रदान किया और उसका नाम ‘दुखी कृष्णदास’ रख दिया।

सेवा में निष्ठा: घाव और कीड़े भी रोक न सके

दुखी कृष्णदास अपने गुरुदेव की सेवा अत्यंत निष्ठा से करते थे – नित्य नाम जप, संकीर्तन, हरी कथा श्रवण। फिर भी उन्हें लगता था कि कुछ अधूरा है। एक दिन उन्होंने गुरुदेव से भारत के पवित्र तीर्थों की यात्रा करने की अनुमति मांगी। गुरुदेव की अनुमति मिलने पर, वे आठ साल तक तीर्थों की सेवा करके सन् १५६२ में अपने गाँव पहुँचे और माता-पिता के दर्शन किए।

माता-पिता की इच्छा से उन्होंने गौरांगी दासी नामक कन्या से विवाह कर लिया। परंतु, उनका मन सदा श्री प्रिय-लाल जी की लीलाओं का स्मरण करता रहता था। एक दिन वृंदावन के विरह को सहन न कर पाने की वजह से, वे अधिक समय तक अपने गाँव में नहीं रह पाए और गुरुदेव से आज्ञा मांगने अम्बिका कलना पहुँचे। उन्होंने कुछ दिन गुरुदेव की सेवा में रहने का निश्चय किया।

गुरुदेव ने दुखी कृष्णदास को श्री गौर-नितानंद की छोटी सी फुलवारी के लिए गंगा जी से जल लाने की सेवा प्रदान की। नित्य प्रति कृष्णदास अपने सिर पर सैकड़ों मिट्टी के भारी घड़े भरकर जल लाने की सेवा करने लगे। सेवा करते-करते उनका मन हरिनाम की मस्ती में मग्न रहता और उन्हें यह भी पता नहीं चलता था कि उनके सिर पर घाव हो गया है। धीरे-धीरे घाव बढ़ता गया और उसमें कीड़े तक पड़ गए।

एक दिन सेवा करते समय, कृष्णदास जी के सिर का एक कीड़ा पृथ्वी पर गिरा, जहाँ गुरुदेव खड़े थे। गुरुदेव ने कृष्णदास जी के सिर का निरीक्षण किया और पाया कि उन्हें गहरा घाव हो गया है और उसमें कीड़े पड़ गए हैं। श्री हृदय चैतन्य प्रभु ने सोचा कि इतना गहरा घाव होने के बावजूद इन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया, क्योंकि यदि वे बताते तो शायद यह सेवा उनसे छीन ली जाती। यह तो एक पक्का शिष्य है। गुरुदेव का हृदय करुणा से भर आया और उन्होंने अपना कर-कमल श्री कृष्णदास जी के घाव पर रख दिया। हाथ रखते ही एक क्षण में घाव भर गया और कीड़े गायब हो गए।

श्री कृष्णदास जी को श्री राधा-कृष्ण की सेवा का अधिकारी जानकर, गुरुदेव ने उन्हें श्री वृंदावन भेजने का निश्चय किया। उन्होंने आज्ञा दी, “ब्रज में जाकर षड्-गोस्वामियों के भक्ति शास्त्रों का अध्ययन श्रीपाद जीव गोस्वामी के आश्रय में करना, तुम्हें श्री युगल चरणों की प्राप्ति होगी।” गुरुदेव ने उनके कुछ सखाओं और परिचितों के लिए भी प्रेम संदेश भेजे और साथ ही यह भी कहा कि श्री ब्रज जाकर षड्-गोस्वामियों को उनकी ओर से दंडवत प्रणाम निवेदन करें।

तीर्थ यात्रा और श्रीपाद जीव गोस्वामी से भेंट

श्री दुखी कृष्णदास प्रथम नवद्वीप धाम पहुँचे। वहाँ श्री जगन्नाथ मिश्र (श्री महाप्रभु के पिता) के पुराने घर का पता पूछकर वे वहाँ गए। वहाँ उन्हें वृद्धावस्था में श्री ईशान ठाकुर के दर्शन हुए, जो महाप्रभु के घर के सेवकों में से एक थे। श्री महाप्रभु सहित उनके अधिकांश परिजन भगवान के धाम पधार चुके थे, परंतु श्री ईशान ठाकुर अभी भी विराजमान थे और उन्होंने दुखी कृष्णदास को आशीर्वाद भी दिया।

आगे यात्रा करते हुए, दुखी कृष्णदास गया धाम पहुँचे और वहाँ श्री विष्णु के दर्शन किए। इसी स्थान पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने गुरु श्री ईश्वरपुरी से हरिनाम दीक्षा ग्रहण की थी। इस लीला का स्मरण कर उन्हें अपार हर्ष हुआ। गया से निकलकर वे काशी धाम पहुँचे और वहाँ श्री तपन मिश्र, श्री चंद्रशेखर आदि अनेक भक्तों के दर्शन कर उनसे शुभ आशीर्वाद प्राप्त किए। अंततः वे मथुरा आ पहुँचे।

उन्होंने गोकुल जाकर नंदभवन के दर्शन किए और उसके बाद श्री बरसाना धाम के दर्शन किए। श्री गिरिराज गोवर्धन और यावत् ग्राम के दर्शन करते हुए वे राधाकुंड क्षेत्र में पधारे। श्री कृष्णदास जी ने वहाँ श्री राधा-गोविंद, श्री राधा-गोपीनाथ और श्री राधा-मदन मोहन जी मंदिरों के दिव्य दर्शन प्राप्त करके आनंद में झूम उठे। राधाकुंड में ही उन्हें श्रीपाद रघुनाथदास गोस्वामी और श्रीपाद कृष्णदास कविराज गोस्वामी के दर्शन हुए। श्रीपाद रघुनाथ दास जी ने उन्हें श्रीपाद जीव गोस्वामी की भजन कुटीर का रास्ता बताकर वहाँ भेज दिया।

श्रीपाद जीव गोस्वामी की भजन कुटीर पर पहुँचकर कृष्णदास जी ने दंडवत प्रणाम किया और अपना परिचय दिया। श्रीपाद जीव गोस्वामी यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए कि कृष्णदास को श्री हृदय चैतन्य ने उनके पास भेजा है। जब श्री जीव गोस्वामी के मार्गदर्शन में कृष्णदास भक्ति साहित्य का अध्ययन करने लगे, तब उन्हें लगा कि सभी रसों में माधुर्य रस की उपासना भगवान से संबंध स्थापित करने में सर्वोपरि है। धीरे-धीरे श्री कृष्णदास जी का मन प्रिय-प्रियतम की निकुंज-रस सेवा की ओर खिंचने लगा। उन्होंने जीव गोस्वामी से माधुर्य-रसोपासना के रहस्य को विस्तार से समझाने की प्रार्थना की।

जीव गोस्वामी की कृपा से, धीरे-धीरे कृष्णदास को ब्रजरज माहात्म्य, निकुंज-रस लीला एवं ब्रज की विशेष उपासना पद्धति का ज्ञान होने लगा। एक दिन श्री जीव गोस्वामी ने श्री कृष्णदास जी को श्री सेवा कुंज की गलियों की सफाई करने की सेवा प्रदान कर दी। नित्य प्रति श्री कृष्णदास जी खुरपा और सोहनी लेकर सेवा कुंज जाते और सम्पूर्ण क्षेत्र की सफाई करते। श्री कृष्णदास जी की वृंदावन-रज में बड़ी निष्ठा थी। रसिक संतों की वाणी में प्रमाण मिलता है कि जो वृंदावन रास के रसिक हैं, वे प्यास से मर जाएँगे, परंतु जिस जल को ब्रज-रज का स्पर्श न हुआ हो, वह जल ग्रहण नहीं करेंगे। स्वामी श्री हरिदास जी ने अपनी लीला में प्रकट किया है कि वृंदावन-रज का एक-एक कण परास मणि के समान है।

श्री राधा जी की कृपा: नूपुर और ‘श्यामानंद’ नाम की प्राप्ति

श्री दुखी कृष्णदास जी अपने हाथों-पैरों पर झुककर, अत्यंत निपुणता से सेवा-सफाई किया करते थे। उनका सम्पूर्ण शरीर ब्रजरज से ढका रहता था। इस प्रकार सेवा करते-करते पूरे बारह वर्ष बीत गए, परंतु श्री कृष्णदास जी ने कभी भी जीव गोस्वामी से यह प्रश्न नहीं पूछा कि उन्हें केवल सेवा कुंज में झाड़ू लगाने की ही सेवा क्यों प्रदान की गई है।

कभी-कभी श्री कृष्णदास जी को लाडली जी के चरण-चिह्नों का दर्शन हो जाता और कभी श्री लाल जी के चरणों का दर्शन हो जाता। मन ही मन वे नित्य श्री लाडली जी को पुकारते और कहते कि चरण-चिह्नों का दर्शन तो आपकी कृपा से होता है, पर कब वह दिन आएगा जब प्रत्यक्ष चरणों के दर्शन होंगे?

श्री लाडली जी इस प्यारे सखा को दर्शन देना चाहती थीं, परंतु यह उनकी सखियों के हाथ में था। जब तक श्री ललिता (श्री स्वामी हरिदास), श्री विशाखा (श्री हरिराम व्यास), श्री वंशी (हित महाप्रभु) आदि की इच्छा न हो, तब तक श्री लाडली जी कैसे दर्शन दे सकती थीं? श्री राधा जी के मन में एक युक्ति आई। उन्होंने नित्य रास के समय जानबूझकर अपने चरण का एक इंद्रनील मणियों से जड़ित नूपुर (पायल) सेवा कुंज की गलियों में एक अनार के पेड़ के निकट गिरा दिया।

प्रातः काल जब श्री दुखी कृष्णदास जी सेवा कर रहे थे, तब उन्हें एक दिव्य नूपुर के दर्शन हुए। उस दिव्य नूपुर से प्रकाश निकल रहा था। उन्होंने नूपुर को उठाकर मस्तक से लगाया। मस्तक से लगाते ही उनके शरीर में सात्विक भावों का उदय हो गया, आनंद की एक लहर भीतर चल गई। वे समझ गए कि यह अवश्य कोई दिव्य नूपुर है। वे नूपुर को बार-बार कभी सिर से, कभी हृदय से, स्नेह की दृष्टि से देखते और चूमते रहे। उन्होंने उस नूपुर को अपने उत्तरीय वस्त्र में बाँध कर रख लिया और पुनः सेवा में लग गए।

नित्य रास लीला के समय श्री ललिता आदि सखियों ने देखा कि उनके बाएं पैर का नूपुर नहीं है। संत जन इस नूपुर का नाम ‘मंजुघोषा’ बताते हैं। ललिता जी ने राधा जी से पूछा कि आपके बाएं पैर का नूपुर नहीं है। राधा रानी जू ने कहा, “ललिते, लगता है मेरा नूपुर कहीं गिर गया है। सेवा कुंज में जाकर देखो, वहाँ तो नहीं है।”

ललिता समझ गईं कि राधा रानी कोई लीला करना चाहती हैं, इसलिए उन्होंने नूपुर सेवा कुंज में ही छोड़ दिया है। श्री ललिता सखी एक वृद्ध ब्राह्मणी के वेश में सेवा कुंज गईं और कृष्णदास से पूछा, “बाबा, आपने यहाँ कहीं नूपुर देखा है? मेरी बहू फूल लेने गई थी, पर पास में उसे शेर दिखाई पड़ा, इसलिए डरकर सुरक्षित स्थान पर भाग गई। इसी बीच उसका नूपुर पैर से निकलकर गिर पड़ा होगा। यदि तुम्हें मिला हो तो हमें दे दो?”

उस वृद्ध ब्राह्मणी ने अपना नाम राधिका, गोत्र कान्यकुब्ज और निवास स्थान मथुरा का यावत् ग्राम बताया। श्री कृष्णदास जी तो संत थे, वे असत्य कैसे बोलते? उन्होंने कहा, “हाँ, मुझे मिला तो है एक दिव्य नूपुर, पर वह तुम्हारा नहीं है। जिसे देखते ही मन में अद्भुत आनंद हो गया, स्पर्श करते ही प्रेम-समुद्र में गोते लगाने लगा। यह कोई साधारण नूपुर नहीं है, जिसका है उसी को दूँगा। आप अपनी बहू को यहाँ लेकर आओ, उसके चरणों में ऐसा ही दूसरा नूपुर देखकर दे दूँगा।”

श्री ललिता जी ने बहुत मनाने का प्रयत्न किया, परंतु श्री दुखी कृष्णदास जी नहीं माने। नूपुर के बिना नित्य रास लीला कैसे होती? श्री प्रिया-प्रियतम के जो आभूषण हैं, वे भी नित्य हैं, नित्य सहचारियाँ हैं। जो वे अपने श्रीअंग पर धारण करते हैं, वह प्रेम-स्वरूप है, रस-स्वरूप है। श्री राधा जी गुप्त रूप में वहीं कुंजों में अपनी सखियों विशाखा, वृंदा, इन्दुलेखा आदि के साथ खड़ी थीं। जब कृष्णदास नहीं माने, तब श्री ललिता सखी ने कृष्णदास से कहा, “बाबा, आप इस नूपुर के बदले कोई वरदान मांग लो, पर नूपुर लौटा दो।”

आपने ठीक कहा, यह नूपुर साधारण नहीं है। यह नूपुर श्री राधारानी जू का है और मैं श्री स्वामिनी जू की सखी ललिता हूँ। श्री कृष्णदास जी ने ललिता सखी से अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराने की प्रार्थना की। ललिता जी ने अपने दिव्य रूप में दर्शन दिए। श्री कृष्णदास जी ने ललिता जी के चरणों में प्रार्थना की कि उन्हें गोलोक में श्री प्रिया जी की निकुंज-सेवा प्राप्त हो।

श्री ललिता जी ने कहा, “यह तो केवल इस भौतिक शरीर के छूटने पर ही संभव है।”

इस पर कृष्णदास जी ने ललिता जी के चरण पकड़कर विनती करते हुए कहा, “ठीक है, पर आप कृपा करके हमें स्वामिनी जू के चरणों का दर्शन करवा दीजिए।”

श्री राधा जी बड़ी प्रसन्न हुईं और ललिता जी से बोलीं, “ललिता जू! अब तो तुम्हें इस सखी को दर्शन देना ही पड़ेगा। दुखी कृष्णदास की सेवा से हम अत्यंत प्रसन्न हैं।” श्री प्रिया जी ने कहा, “ललिता जू! तुम कृष्णदास को ललिता कुंड में स्नान कराओ और उन्हें सिद्ध राधा-मंत्र प्रदान करो। जब ये कुंड में स्नान कर लेंगे और दिव्य मंजरी स्वरूप धारण कर लेंगे, तब ये मेरे दर्शन के पात्र बन जाएंगे।”

श्री ललिता जी ने कृष्णदास जी के कान में षड्-ऐश्वर्य पूर्ण पंचदशाक्षरी (१५ अक्षरी) श्री राधा-मंत्र प्रदान किया और उस मंत्र को जपते हुए कृष्णदास राधाकुंड में स्नान करने गए। श्री कृष्णदास जी के कुंड में स्नान करते ही वे दिव्य मंजरी सखी के वेष में बाहर आए। उस दिव्य मंजरी का शरीर स्वर्ण की भांति चमक रहा था।

श्री ललिता जी अपने साथ उस मंजरी को लेकर गुप्त वृंदावन में राधा रानी के निकुंज मंदिर में प्रवेश कर गईं। श्री राधारानी के दर्शन पाकर हृदय अत्यानंद से भर गया। श्री राधारानी ने अपना चरण आगे करके कहा, “देख सखी! ऐसा ही दूसरा नूपुर मिला है ना तुम्हें? दो अब हमारा नूपुर।” मंजरी सखी (कृष्णदास) कहने लगी, “हे स्वामिनी जू! आपने इतनी कृपा की तो अब क्यों कसर छोड़ती हैं? आपकी कृपा से रसिकों को जिस भाव की प्राप्ति होती है, उस भाव की संतुष्टि केवल चरण-दर्शन से नहीं होती। आप कृपा करके अपने श्रीचरणों की सेवा प्रदान करें।”

श्री राधा जी ने अपना चरण आगे कर दिया। मंजरी सखी ने अपने नयनों के जल से प्रिया जी के चरणों का अभिषेक किया और अपने हाथों से उनके चरणों में नूपुर पहनाने की प्रार्थना की। नूपुर धारण कराने से पहले ललिता जी ने प्रिया जी की आज्ञा से नूपुर को मंजरी सखी के ललाट से स्पर्श कराया। नूपुर के स्पर्श से पूर्व का जो तिलक था, वह नूपुर-आकार के तिलक में परिवर्तित हो गया। राधा रानी ने स्वयं अपने कर-कमलों द्वारा कुमकुम, चंदन और कपूर को चंद्रकांत नामक पत्थर पर घिसकर उस तिलक के मध्य में एक उज्ज्वल बिंदु लगाया।

इस तिलक को ललिता सखी ने ‘श्याममोहन तिलक’ का नाम दिया और कहा कि तुमने श्री प्रिया जी को अपनी सेवा से प्रसन्न करके बहुत आनंद प्रदान किया है, अतः तुम्हें अब संसार में ‘श्यामानंद’ नाम से जाना जाएगा। स्वर्ण जैसी कांति होने के कारण विशाखा सखी ने उसे ‘कनक मंजरी’ यह नाम प्रदान किया। श्री प्रिया जी ने कहा, “हे कृष्णप्रिया! क्योंकि तुम मधुसूदन को सुख प्रदान करने तथा मेरे नयनों को भी सुख प्रदान करने वाली हो, इसलिए तुम मुझे ललिता और विशाखा जैसी ही प्रिय हो। पूर्व में तुम कृष्णप्रिया नाम की मेरी सहचरी ही थी।”

उसके बाद ललिता और विशाखा ने कहा, “श्री राधारानी की विशेष कृपा से इस कनक मंजरी को यह दिव्य नूपुर प्राप्त हुआ है, अतः यह सखी अत्यंत सौभाग्यशालिनी है। श्री वृंदावन की रज का प्रताप ही ऐसा है।”

श्री प्रिया जी के चरणों में श्यामा सखी (मंजरी) ने अपने हाथों से नूपुर धारण कराया। राधारानी ने श्यामानंद जी को पुनः मृत्युलोक में जाने का जब आदेश दिया, तब वे स्वामिनी जी से विरह की कल्पना करते ही रोने लगे। वे बार-बार श्री प्रिय जी से अपने चरणों की सेवा से अलग न करने की विनती करने लगे।

तब राधारानी का हृदय दया से भर आया और उनके हृदय-कमल से अपने प्राण-धन श्रीश्यामसुंदर का एक दिव्य विग्रह प्रकट हुआ। श्री प्रिया जी ने ललिता सखी के माध्यम से श्यामानंद को यह श्रीविग्रह प्रदान किया। संतों का मत है कि यह घटना १३ जनवरी १५७८ को वसंत पंचमी वाले दिन की है।

श्री प्रिया जी ने श्यामानंद जी से कहा, “जब तक तुम जीवित रहोगे, तब तक प्रेम से श्यामसुंदर के इस श्रीविग्रह की सेवा करते रहना। ऐसा करने से तुम्हें मेरे विरह का ताप नहीं सताएगा। मृत्युलोक में अपना कार्य पूर्ण हो जाने पर तुम नित्य गोलोक धाम में मेरे चरणों की सेवा प्राप्त करोगे।” श्री प्रिय जी ने स्वयं कहा कि इस दुर्लभ श्रीविग्रह की कृपा से कलिमल से ग्रसित जीवों का सहज ही उद्धार हो जाएगा, और यह सब तुम्हारी सेवा का प्रताप है। तुम न होते तो यह अद्भुत श्यामसुंदर का श्रीविग्रह कलियुगी जीवों के लिए कैसे सुलभ हो पाता?

ललिता सखी ने उसके बाद श्यामानंद जी से कहा, “इस दिव्य लीला के विषय में श्री जीव गोस्वामी के अतिरिक्त किसी से भी कहना नहीं। यदि तुमने ऐसा किया तो तुम अल्पायु होकर श्री प्रिया जी की कृपा से वंचित हो जाओगे। मैंने तुम्हें जो सिद्ध राधा-मंत्र प्रदान किया है, उसके स्मरण मात्र से तुम्हें श्री प्रिया जी के दर्शन किसी भी समय सुलभ होंगे। यदि कोई विपत्ति आए तो उस मंत्र का स्मरण कर लेना।” इतना कहकर श्री ललितादि सखियाँ और राधारानी अंतर्धान हो गए। श्री राधा जी की इच्छा से श्यामानंद जी पुनः अपने पुरुष रूप में आ गए। उस दिव्य श्यामसुंदर श्रीविग्रह को सिर पर रखकर श्यामानंद जी श्रीपाद जीव गोस्वामी की कुटिया पर आए।

श्री जीव गोस्वामी ने देखा कि दुखी कृष्णदास के वक्ष स्थल पर ‘श्यामानंद’ लिखा हुआ है, राधा रानी के चरण-आकार और मध्य में उज्ज्वल बिंदु का नवीन तिलक है, अत्यंत सुंदर श्यामसुंदर का श्रीविग्रह है, उनका लोहे का खुरपा स्वर्ण के खुरपे में परिवर्तित हो गया है, शरीर स्वर्ण की भांति चमक रहा है, आँखों से अश्रुपात हो रहा है।

जीव गोस्वामी ने पूछा, “कृष्णदास! तुम इतने समय से कहाँ थे? तुम्हारा साधारण शरीर सुंदर स्वर्ण-कांतिमय कैसे हो गया?”

कृष्णदास जी बोले, “मैं इतने समय से सेवा कुंज में ही था और यह शरीर की स्वर्ण-कांति आपकी कृपा से ही मुझे प्राप्त हुई है।”

जीव गोस्वामी ने कहा, “यह नया तिलक तुम्हें किसने प्रदान किया? यह सुंदर श्रीविग्रह तुम कहाँ से लाए? अवश्य ही तुम पर श्री लाल जू अथवा श्री लाली जू की कृपा हुई है। तुम सब कुछ सत्य कहो।”

श्री कृष्णदास ने एकांत स्थान में ले जाकर जीव गोस्वामी के कान में सारी बात कही। जीव गोस्वामी आनंद-अतिरेक से नाचने लगे, उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। कृष्णदास को आलिंगन प्रदान करते हुए उन्होंने कहा, “तुम बहुत भाग्यशाली हो, राधारानी के विशेष कृपापात्र हो। केवल इस लीला के स्मरण मात्र से मेरे शरीर में कम्पन पैदा हो रही है।”

श्री कृष्णदास जी बोले, “यह सब आपकी ही कृपा से संभव हुआ है। आपने ही दास को सेवा कुंज की गलियों में झाड़ू लगाने की सेवा प्रदान की। आपकी कृपा से ही दास को प्रिया जी का नूपुर प्राप्त हुआ और राधारानी जी के दर्शन सुलभ हुए। आप जैसे रसिक संत की कृपा और इस ब्रजरज के प्रताप का ही यह परिणाम है।”

श्री कृष्णदास जी ने जीव गोस्वामी से विनती करते हुए कहा कि वे इस बात को किसी से न कहें। यदि कोई पूछे तो कृपा करके यही कहें कि “यह सब कृष्णदास जी के गुरुदेव भगवान का ही कृपा प्रसाद है।” उसके बाद श्री जीव गोस्वामी ने सबको यह कह दिया कि कृष्णदास जी के गुरुदेव की कृपा और इच्छा से अब उनका नाम श्यामानंद है और उनके इस तिलक का नाम ‘श्यामनंदी तिलक’

श्री श्यामानंद जी ने प्रिया जी द्वारा प्रदान किया हुआ भगवान का श्रीविग्रह अपने भजन कुटीर में पधरा दिया और नित्य प्रेम से उसकी सेवा करने लगे। धीरे-धीरे नए तिलक और नाम की बात समस्त ब्रज मंडल और बाहर भी प्रसिद्ध होने लगी।

गुरु हृदय चैतन्य द्वारा परीक्षा

एक दिन गौड़ देश (बंगाल) से कुछ वैष्णव वृंदावन दर्शन और गोवर्धन परिक्रमा को पधारे। वे सब श्यामानंद का नया तिलक एवं नाम देखकर आश्चर्य में पड़ गए। गौड़ देश वापस लौटने पर उन्होंने श्री हृदय चैतन्य (कृष्णदास के गुरुदेव) को बताया कि उनके शिष्य कृष्णदास ने अपनी परंपरा और गुरु का त्याग कर अपना नाम श्यामानंद रख लिया है और नया तिलक भी धारण कर लिया है। इस तिलक को ब्रज में ‘श्यामनंदी तिलक’ कहा जा रहा है।

उन यात्री वैष्णवों की बात सुनकर श्री हृदय चैतन्य को शिष्य के ऐसे अवैष्णव व्यवहार से क्रोध आया। हृदय चैतन्य अपने साथ ६४ महंत, १२ गोपाल और अन्य कुछ वैष्णवों को लेकर वृंदावन के धीर समीर घाट पर पहुँचे। सही बात का निर्णय करने के लिए कल्प कुंज में वैष्णवों की एक बड़ी सभा आयोजित की गई।

सभी वैष्णवों की उपस्थिति में हृदय चैतन्य ने श्यामानंद जी से पूछा, “ऐसी क्या बात हो गई कि तुमने अपने गुरुदेव का त्याग करके नया तिलक और नाम धारण किया? हम तुम्हारे इस अवैष्णव व्यवहार से दुखी हैं। किसकी आज्ञा से तुमने ऐसा कर्म किया, यह हमें बताओ?”

श्री श्यामानंद जी बोले, “मैंने आपका त्याग नहीं किया, मैं तो आपका ही बालक हूँ। यह नया तिलक और नाम मुझे आपकी ही कृपा से प्राप्त हुआ है।”

श्यामानंद जी ने वैष्णव सभा में कहा कि उन्होंने कोई नया नाम और तिलक कृष्णदास को प्रदान नहीं किया है। यह कृष्णदास कहता है कि उनकी कृपा से उसे नया तिलक और नाम प्राप्त हुआ है। “मैं अभी इस तिलक और वक्ष स्थल पर लिखे नाम को मिटा दूँगा। यदि वास्तव में यह हमारी कृपा से प्राप्त हुआ है, तो यह नहीं मिटेगा।”

हृदय चैतन्य ने खूब रगड़ कर तिलक और वक्ष स्थल पर अंकित नाम को मिटाने का प्रयास किया। मस्तक से रक्त निकलने लगा, पर तिलक और नाम नहीं मिटा। श्यामानंद जी ने वैष्णव समाज से कहा कि उन्हें कुछ देर का समय दिया जाए। श्यामानंद जी एकांत में गए और ललिता जी द्वारा प्रदान किया राधा-मंत्र स्मरण करने लगे। मंत्र का स्मरण करते ही वे दिव्य मंजरी रूप धारण कर श्री प्रिया जी के पास जा पहुँचे। उन्होंने प्रिया जी के चरणों में प्रणाम करके सारी बात कही।

श्री प्रिया जी ने अपने भाई और कृष्ण के सखा ‘सुबल’ को वैष्णव सभा में जाकर श्यामनंदी तिलक की रक्षा का भार सौंप दिया। श्यामानंद जी के वापस वैष्णव सभा में उपस्थित होने पर श्रीकृष्ण के सुबल सखा ने दिव्य रूप में प्रकट होकर हृदय चैतन्य से कहा कि यह तिलक और नाम स्वयं श्री राधारानी ने इनकी सेवा से प्रसन्न होकर प्रदान किया है। श्री राधा जी को श्यामानंद जी अत्यंत प्रिय हैं। श्री राधारानी का दिया कौन मिटा सकता है? देखते-देखते श्यामानंद जी के मस्तक पर पहले से भी अधिक उज्ज्वल तिलक प्रकट हो गया और वक्ष स्थल पर लिखा नाम भी प्रकट हो गया। समस्त वैष्णव समाज हरिनाम संकीर्तन करने लगा और श्यामानंद जी पर राधारानी की विशेष कृपा सत्य मानकर उनके भाग्य की सराहना करने लगा।

श्री हृदय चैतन्य को बहुत दुःख हुआ। वे मौन हो गए। शास्त्र वचन है कि यदि माता, पिता और गुरु, तीनों में से कोई भी आपके सामने हाथ जोड़े या क्षमा याचना करे, तो आपके समस्त पुण्य नष्ट हो जाते हैं। हृदय चैतन्य ने कुछ कहा नहीं, बस श्यामानंद जी को आशीर्वाद देकर सब वैष्णवों को लेकर ब्रज यात्रा के लिए निकल पड़े। श्यामानंद जी भी गुरुदेव के पीछे चल दिए।

दंड उत्सव की परंपरा

बारह वैन और अन्य स्थानों के दर्शन करने के बाद सभी वैष्णव संकेत कुंज नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ कुछ बालक-बालिकाएं रासलीला का अभिनय कर रही थीं। रास का दर्शन करते ही श्यामानंद जी गोपी भाव में भरकर एक स्त्री की भांति कलाइयाँ मोड़कर नृत्य करने लगे और घुंघट करने जैसा शरमाने लगे। श्री हृदय चैतन्य की परंपरा में सख्य रस (भगवान् से सख्य) की उपासना प्रधान थी, परंतु श्रीपाद जीव गोस्वामी जी की देख-रेख में भक्ति शास्त्रों का अध्ययन करते-करते उनका मन माधुर्य रस की उपासना में ही डूब चुका था।

ब्रज के रसिक वैसे तो प्रिय-प्रियतम को एकरूप ही समझते हैं, परंतु उनके मन का झुकाव श्री प्रिया जी की ओर कुछ अधिक होता है। श्री हृदय चैतन्य को लगा कि उनकी परंपरा के विरुद्ध इन्होंने श्रीकृष्ण-सख्य रस उपासना त्याग कर श्री राधा की माधुर्य रस उपासना आरम्भ कर दी है। गुरुदेव ने श्यामानंद जी से नृत्य बंद करने और इस माधुर्य रस उपासना को रोकने के लिए कहा, परंतु श्यामानंद जी भाव में ऐसे डूबे थे कि उन्हें कुछ पता ही नहीं चला।

क्रोध में भरकर हृदय चैतन्य ने लकड़ी से श्यामानंद जी के मस्तक पर प्रहार किया। रक्त बहने लगा, परंतु श्यामानंद जी ने मार को भी गुरु-कृपा ही समझा। उन्होंने गुरुदेव से कुछ भी नहीं कहा। गुरुदेव क्रोध में भरकर वहाँ से चले गए।

रात्रि में हृदय चैतन्य को स्वप्न में श्री गौरहरी चैतन्य महाप्रभु के दर्शन हुए। उन्होंने सफ़ेद वस्त्र धारण किया था और उस वस्त्र पर रक्त लगा हुआ था। हृदय चैतन्य ने महाप्रभु से पूछा कि आपके वस्त्र पर रक्त कैसे लग गया? महाप्रभु ने कहा, “तुमने श्यामानंद को चोट पहुँचाई, उसका घाव मैंने अपने ऊपर ले लिया है। श्यामानंद मुझे बहुत प्रिय है, उस पर प्रहार करके तुमने वैष्णव-अपराध किया है।”

हृदय चैतन्य काँप गए और महाप्रभु से बार-बार चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे। महाप्रभु ने कहा, “इस अपराध का प्रायश्चित्त करने के लिए १२ दिन का दंड उत्सव करो। सभी संत-महात्माओं की सेवा करो, कथा-कीर्तन का आयोजन करो और आगे वैष्णव-अपराध कभी न हो, इसका विशेष ध्यान रखना।” श्री महाप्रभु इतना कहकर अंतर्धान हो गए। प्रातः हृदय चैतन्य ने सभी वैष्णवों को बुलाकर महाप्रभु द्वारा बताए गए १२ दिन का दंड उत्सव करवाने का निश्चय किया।

जब श्री श्यामानंद जी को इस बात का पता चला, तब उन्होंने वैष्णव समाज से प्रार्थना करते हुए कहा, “इसमें गुरुदेव भगवान की कोई गलती नहीं है। यदि वे यह उत्सव फिर भी करना ही चाहते हैं, तो उत्सव इनके स्थान पर मुझे करने की अनुमति मिले। जिस तरह से गुरु की समस्त संपत्ति पर शिष्य का अधिकार होता है, वैसे ही गुरु के दंड पर भी शिष्य का ही अधिकार है।”

श्यामानंद जी की गुरु-भक्ति देखकर सभी वैष्णव प्रसन्न हुए और सभा में निर्णय किया गया कि यह १२ दिन का दंड उत्सव अब श्यामानंद जी ही करेंगे। श्री श्यामानंद जी ने श्रीपाद जीव गोस्वामी और अन्य वैष्णवों की सहायता से वृंदावन में पहला दंड उत्सव मनाया। संत-महात्माओं की खूब सेवा इस उत्सव में हुई। आगे चलकर श्यामानंद जी के शिष्य श्री रसिक मुरारि जी ने इस उत्सव की परंपरा को चलाया।

श्री राधा के अद्भुत श्री विग्रह का प्राकट्य और श्री लाड़-लाल का विवाह

श्री हृदय चैतन्य श्यामानंद प्रभु को आशीर्वाद देकर अन्य वैष्णवों सहित अपने ग्राम वापस लौट गए। श्री श्यामानंद जी अब अपने आराध्य श्री श्यामसुंदर की सेवा में निमग्न रहने लगे।

एक दिन भरतपुर रियासत के राजा के कोष में रातों-रात राधारानी का एक दिव्य विग्रह स्वयं प्रकट हो गया। यह घटना १५७८ ईस्वी की है। उस रात श्री श्यामसुंदर ने श्यामानंद जी को स्वप्न में कहा, “मेरी राधारानी भरतपुर के राज-प्रासाद में प्रकट हो गई हैं। तुम मेरा उनके साथ विवाह कराओ।” उधर स्वयं प्रकटित राधारानी ने भरतपुर के महाराज को भी स्वप्न में आदेश दिया, “मेरे श्यामसुंदर श्रीधाम वृंदावन में श्यामानंद की कुटिया में विराजते हैं। तुम उनके साथ मेरा विवाह संपन्न कराओ।”

राजा की निद्रा भंग हो गई। उन्होंने उसी समय अपनी रानी को जगाकर स्वप्न के विषय में बताया। सुबह होते ही जब वे दोनों अपने भंडार-गृह में गए, तो उन्हें वहाँ मूल्यवान रत्नों के मध्य राधारानी के स्वयं प्रकटित अपूर्व सुंदर श्रीविग्रह का दर्शन हुआ। राजा-रानी ने श्री राधा जी के उस दिव्य विग्रह का श्रृंगार करके विधि-विधान से पूजन किया।

शुभ मुहूर्त देखकर भरतपुर के राजा-रानी अपने राजपुरोहित और मंत्रियों को साथ लेकर श्रीधाम वृंदावन में श्यामानंद प्रभु की कुटिया पहुँचे। श्री श्यामसुंदर की अपूर्व लावण्यमय त्रिभंगी श्रीविग्रह का दर्शन करके वे भाव-विभोर हो उठे। सन् १५८० ईस्वी में वसंत पंचमी के शुभ दिन श्री वृंदावन में श्री श्यामसुंदर एवं राधारानी के दिव्य विग्रहों का विवाह उत्सव बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ।

राजदंपति ने कन्यादान किया। इस प्रकार श्यामा-श्यामसुंदर विग्रह-रूप से परिणय-सूत्र में बंध गए। विवाहोपरांत भरतपुर के राजा ने श्री राधा-श्यामसुंदर का विशाल मंदिर बनवाया और एक गाँव तथा बहुत सी संपत्ति मंदिर की सेवा में समर्पित की। इस घटना के बाद जयपुर के महाराजा ने श्यामली नाम का गाँव श्यामानंद जी को दान में दिया।

वृंदावन में षड्-गोस्वामियों द्वारा लिखे हुए भक्तों के ग्रंथों का प्रचार बंगाल क्षेत्र में हो, इसलिए वृंदावन के गौड़ीय वैष्णव गोस्वामियों ने ग्रंथों की प्रतियाँ साथ देकर श्यामानंद प्रभु, नरोत्तम दास और श्रीनिवास आचार्य को बंगाल प्रांत में जाने की आज्ञा दी। राह में विरहम्बीर नाम के वनविष्णुपुर के राजा ने सारे ग्रन्थ चोरी कर लिए। श्रीनिवास आचार्य वहीं पर ग्रंथों की खोज करने हेतु रुके रह गए।

श्री नरोत्तमदास जी और श्यामानंद जी निकल कर खेतुरी ग्राम में आए। वहाँ कुछ दिन बिताकर श्यामानंद जी अम्बिका कलना ग्राम में गुरुदेव के दर्शन हेतु गए। कुछ दिन गुरुदेव की सेवा में रहे और गुरुदेव की आज्ञा से हरिनाम का प्रचार उत्कल देश में करने लगे।

वन के पशुओं और दो शेरों पर कृपा

रास्ते में घने जंगलों से होते हुए उन्होंने न केवल मनुष्यों का उद्धार किया, परंतु हाथी, सिंह, भालू, मोर, हिरन आदि पशुओं को भी हरिनाम मंत्र प्रदान करके तार दिया। चलते-चलते अचानक दो बड़े-बड़े शेर उनका रास्ता रोक कर खड़े हो गए। उनकी दहाड़ सुनकर सभी वैष्णव भयभीत होने लगे।

श्री श्यामानंद जी ने हाथ उठाकर कहा, “श्री हरिनाम मंत्र का उच्चारण करो।” हरिनाम गाने लगे। श्रवण करते ही वे शेर शांत हो गए। श्यामानंद प्रभु के पास आकर दोनों ने झुककर प्रणाम किया और वहाँ से निकल गए।

आगरा में यवन अधिकारी पर कृपा

सभी वैष्णव जब आगरा पहुँचे, तब वहाँ के यवन अधिकारी के कुछ सिपाहियों ने सब वैष्णवों सहित श्यामानंद जी को पकड़ लिया और कारागृह में डाल दिया। उन्हें शंका थी कि ये डाकू हैं, क्योंकि उनके पास अपना कोई पहचान पत्र या चिन्ह नहीं था। रात में भगवान श्रीकृष्ण ने नरसिंह रूप धारण किया और यवन अधिकारी को स्वप्न में प्रकट होकर कहा कि सभी वैष्णवों को कैद से मुक्त करे, अन्यथा परिणाम अच्छा नहीं होगा।

अगले दिन वह यवन अधिकारी भागकर श्यामानंद जी के पास आया और चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा। श्यामानंद जी ने उसे क्षमा किया और हरिनाम महामंत्र का प्रसाद प्रदान कर उसे वैष्णव बना दिया। उसे साधु-सेवा करते रहने का उपदेश देकर श्यामानंद जी आगे की यात्रा करने लगे।

भाटभूमि को श्राप से मुक्त कराना

प्रयाग और वाराणसी होते हुए सभी वैष्णव गौड़ मंडल पहुँचे और बागड़ी नामक स्थान पर श्री श्याम रे का दर्शन किया। वहाँ से सभी वैष्णव भाटभूमि आए, जहाँ के राजा ने बाद में श्यामानंद प्रभु से दीक्षा भी ग्रहण की। बहुत साल पहले उस क्षेत्र के किसी पूर्व राजा ने एक बार एक वैष्णव संत का अपमान कर दिया था। संत ने श्राप दे दिया और उस श्राप के प्रभाव से भाटभूमि में एक हिंसक शेर का आतंक फैला हुआ था।

उस शेर के आतंक से सभी भयभीत थे। जिस दिन श्री श्यामानंद प्रभु के चरण भाटभूमि पर पड़े, उस दिन वह शेर वहाँ नहीं दिखाई दिया। सभी को आश्चर्य हुआ कि आज शेर ने आतंक क्यों नहीं फैलाया। श्री श्यामानंद प्रभु ने कहा, “अब कोई शेर यहाँ आतंक नहीं फैलाएगा। सभी लोग संतों का आदर करें और हरिनाम संकीर्तन करके अपना जीवन सफल बनाएँ।” इस तरह श्री श्यामानंद प्रभु की कृपा से वह क्षेत्र श्राप से मुक्त हो गया।

पठान शेरखान पर कृपा :

श्री हरिनाम का प्रसाद सर्वत्र  वितरित करते हुए श्यामानंद प्रभु धारेन्दा ग्राम पहुंचे । वहाँ पर एक दुष्ट पठान रहता था जिसका नाम था शेर खान । उसको नाम संकीर्तन केवल नाच गाना और हल्ला गुल्ला ही लगता था ।अपने कुछ साथियो को लेकर उसने वैष्णवो के मृदंग आदि सब वाद्य तोड़ दिए ।

वैष्णवो को कष्ट होता देखकर श्यामानंद प्रभु ने जोश में भरकर हुंकार किया और देखते देखते वहाँपर भीषण अग्नि प्रकट हो गयी । उस अग्नि से यवनों के दाढ़ी और मूँछ जलने लगे । मुख से रक्त वमन होने लगा और अधमरी अवस्था में वे सब वहाँ से जान बचाकर भागे । अगले दिन श्यामानंद प्रभु आस पास संकीर्तन कर रहे थे उस समय पठान शेर खान उनके पास आकर चरणों में गिर पड़ा ।

श्यामानंद प्रभु से क्षमा याचना करते हुए कहने लगा – कल रात स्वप्न में मैंने अल्लाह को बहुत भयंकर रूप में देखा । कुछ देर बाद वे सुंदर रूप में दिखाई दिए और उन्होंने अपना परिचय चैतन्य प्रभु नाम से दिया । उन्होंने मुझसे कहा की श्यामानंद जी से क्षमा मांगकर उनसे दीक्षा लो अन्यथा तुम्हे नर्क की भयंकर यातनाएं भोगनी पड़ेगी । पठान श्यामानंद प्रभु से कहने लगा – हे प्रभु ! मेरे अपराध को क्षमा करे, आप मुझपर कृपा करके अपना बना लीजिये । श्यामानंद प्रभु ने पठान को क्षमा दिया और हरिनाम मंत्र देकर उसका नाम श्री चैतन्य दास रख दिया ।

श्री दामोदर पंडित पर कृपा :

घंटाशिला पहुँचकर उनकी भेट श्री रासिकमुरारि जी से हुई जो आगे चलकर उनके प्रमुख शिष्य भी हुए । श्री रासिक मुरारी ,उनकी पुत्री देवकी और पत्नी इच्छादेवी जिसका नाम बाद में श्यामदासी रखा गया इन सबको श्यामानंद प्रभु ने श्री महामंत्र की दीक्षा प्रदान की । श्री श्यामानंद और रासिकानंद प्रभु ने साथ में हईं घूम कर हरिनाम का बहुत प्रचार किया ।

एक दिन वे चाकुलिया नामक स्थान पर पहुंचे जहांपर रासिकानंद प्रभु के पुराने मित्र दामोदर पंडित भी रहते थे । दामोदर पंडित बहुत विद्वान थे और योगमार्ग से साधना किया करते थे । भक्ति मार्ग में कुछ विशेष रूचि वे नहीं रखते थे । एक दिन रासिकानंद प्रभु ने दामोदर पंडित से कहा की उसे श्यामानंद प्रभु से दीक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए ।

श्री रासिकानंद प्रभु ने दामोदर से कहा की ऐसे संत भगवान् की विशेष कृपा से ही मिलते है । श्री दामोदर पंडित अभिमान में भरकर कहने लगे की वो दीक्षा तभी लेंगे जब उन्हे श्यामानंद प्रभु में कोई विशेष बात की अनुभूति होगी अन्यथा नहीं । चाकुलिया ग्राम में खरबा नदी के तट पर एक छोटे से वन में नित्यप्रति दामोदर पंडित योगसाधना किया करते थे ।

एक दिन योगसाधना करते करते सहसा सर्वत्र प्रकाश फ़ैल गया और दामोदर को दिव्य वृंदावन का दर्शन होने लगा । एक कल्पतरु के निचे रत्नजटित आसान पर मुस्कुराते हुए वंशीधारी श्री श्यामसुंदर विराजमान है और उन्होंने पीले वस्त्र धारण कर रखे है । श्री श्यामानंद प्रभु मंजरी सखी के रूप में प्रभु को पान (ताम्बूल ) अर्पण कर रहे थे ।

यह दृश्य देखकर दामोदर पंडित समझ गए की श्यामानंद प्रभु कोई साधारण मनुष्य नहीं है , वे श्री राधा माधव की कोई सहचरी सखी ही है । इतने पर भी उनका मन श्यामानंद प्रभु से दीक्षा लेने का नहीं हुआ । उन्हें अपने ब्राह्मणत्व का अभिमान था , उनका उच्च कुल का अभिमान उन्हें श्यामानंद प्रभु की शरण में जाने से रोक रहा था । जब वे वन से निकल कर अपने घर पहुंचे तब उन्होंने ने देखा की श्यामानंद प्रभु माला लेकर हरिनाम जप रहे है और उनके शरीर पर स्वर्ण का जनेऊ है ।

दामोदर पंडित की आँखें खुल गयी , वे जान गए की भगवान् की शुद्ध भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ है और इसमें जाती, धर्म का कोई बंधन नहीं है । दामोदर पंडित चरणों में गिरकर क्षमा याचना  करने लगे । १६०९ ई में श्यामानंद प्रभु ने दामोदर पंडित , उनकी माता और दोनों पत्नियो को हरिनाम महामंत्र की दीक्षा प्रदान की और शुद्ध भक्ति के मार्ग पर लगा दिया ।

नविन किशोर धल और रंकिनी देवी पर कृपा

श्यामानंद प्रभु और रासिकानंद प्रभु आगे चलते-चलते धालभूमगढ़ पहुँचे। वहाँ के राजा नविन किशोर धल शाक्त थे और मुंडालिया रंकिनी देवी की आराधना किया करते थे। इस देवी की आराधना तांत्रिक पद्धति से की जाती थी और वह कई मनुष्यों को अपना आहार बना चुकी थी। राजा ने श्यामानंद प्रभु, रासिकानंद प्रभु और अन्य वैष्णवों के ठहरने की व्यवस्था देवी के मंदिर में करवा दी।

मध्य रात्रि के समय भूख से व्याकुल वह देवी जब बाहर निकल रही थी, उस समय उसको श्री श्यामानंद प्रभु और रासिकानंद प्रभु सामने विश्राम करते दिखे। उनके प्रचंड वैष्णव तेज को देखकर देवी भयभीत हो गई और उनके सामने स्वयं को असमर्थ जानकर वह देवी श्यामानंद प्रभु से अपने पापों के लिए क्षमा मांगने लगी।

देवी ने श्यामानंद प्रभु से करबद्ध प्रार्थना की कि वे उसे अपने तेज से भस्म न करें। श्यामानंद प्रभु ने देवी को समझाया कि हिंसा और तामसिक आराधना से मुक्ति नहीं मिलती, बल्कि शुद्ध भक्ति से ही परम गति प्राप्त होती है। देवी ने उनकी बात मान ली और प्रतिज्ञा की कि वह भविष्य में कभी भी मनुष्य का रक्त नहीं पिएगी। श्यामानंद प्रभु ने उसे हरिनाम मंत्र प्रदान किया और शाकाहारी भोग स्वीकार करने का निर्देश दिया। राजा नविन किशोर धल ने जब यह चमत्कार देखा, तो वह भी अत्यंत प्रभावित हुआ और उसने श्यामानंद प्रभु से दीक्षा ग्रहण की। उसके बाद राजा ने देवी के मंदिर में वैष्णव पद्धति से पूजा-अर्चना शुरू करवाई और नरबलि जैसी क्रूर प्रथाओं को सदा के लिए समाप्त कर दिया।

श्यामानंद प्रभु की शिक्षाएँ और जीवन का सार:

श्यामानंद प्रभु का जीवन भक्ति, निष्ठा और गुरु-सेवा का एक अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने न केवल ब्रज के माधुर्य रस का आस्वादन किया, बल्कि अपने दिव्य अनुभव और करुणा से अनगिनत जीवों को कृष्ण भक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया। उनके जीवन की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि भगवान का नाम और संतों की कृपा, जाति, धर्म, या सामाजिक स्थिति की सीमाओं से परे है और हर जीव को परम आनंद और मुक्ति प्रदान कर सकती है। उनके द्वारा स्थापित ‘श्यामनंदी तिलक’ और ‘दंड उत्सव’ आज भी गौड़ीय वैष्णव परंपरा के महत्वपूर्ण अंग हैं।

 


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