श्री टीला जी महाराज (साकेतनिवासाचार्य) की कथा
राजस्थान की पावन भूमि ने अनेक संत-महात्माओं को जन्म दिया है। उन्हीं में एक दिव्य संत हुए – श्री टीला जी महाराज, जिन्हें बाद में उनके गुरुदेव ने साकेतनिवासाचार्य की उपाधि दी। उनका जीवन भक्ति, सेवा और सद्गुरु की शरणागति का अनूठा उदाहरण है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
श्री टीला जी का जन्म विक्रम संवत 1515, ज्येष्ठ शुक्ल 10 को हुआ। जन्मस्थान के विषय में मतभेद है – कुछ मानते हैं कि यह राजस्थान के सलेमाबाद (किशनगढ़) है, जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार यह कालूड़ा गाँव (खाटू-खण्डेला के पास) है।
उनके पिता हरिराम जी एक विद्वान पंडित और माता शीलादेवी संत-सेवा में तत्पर गृहिणी थीं। लंबे समय तक संतान न होने के कारण उन्होंने एक सिद्ध संत से आशीर्वाद पाया और उनके आशीर्वाद से ही टीला जी का जन्म हुआ।
बचपन से ही बालक में दिव्य संस्कार थे। वे अक्सर किसी ऊँचे टीले पर बैठकर समाधि में चले जाते। इसी कारण लोग उन्हें “टीला” कहने लगे। गायत्री उपासना के प्रभाव से उन्हें माँ गायत्री और सरस्वती का साक्षात्कार हुआ। कहा जाता है कि चार वेद, छह शास्त्र और अठारह पुराण उनके हृदय में स्वतः प्रकट हो गए।
भगवान दर्शन की चाह
एक दिन उनके पिता ने उन्हें बालक ध्रुव की कथा सुनाई। कथा सुनते ही बालक टीला ने निश्चय कर लिया कि वह भी तपस्या कर भगवान के दर्शन प्राप्त करेगा। माता-पिता ने भी उनकी दृढ़ता देखकर अनुमति दे दी।
तभी हनुमान जी प्रकट हुए और उन्हें मथुरा स्थित ध्रुव-टीला पर तपस्या करने का आदेश दिया। टीला जी ने वहाँ तप किया। अनेक प्रलोभन और बाधाओं के बावजूद उन्होंने तपस्या नहीं छोड़ी। अंततः भगवान विष्णु प्रकट हुए और दर्शन दिए।
जब भगवान ने वर माँगने को कहा, तब टीला जी ने कहा –
“प्रभु! आपके दर्शन से जीवन धन्य हुआ, लेकिन मुझे अब भी लगता है कुछ अधूरा है। मुझे एक समर्थ सद्गुरु चाहिए।”
भगवान ने आशीर्वाद दिया –
“सद्गुरु स्वयं तुम्हारे पास आएंगे।”
बाँझ गाय से दूध
कुछ समय बाद एक दिन टीला जी गाय चराते हुए वन में भजन कर रहे थे। तभी एक तेजस्वी संत आए और बोले –
“बेटा, मुझे दूध की भिक्षा चाहिए।”
वह संत और कोई नहीं, बल्कि गलता पीठ (जयपुर) के महान संत श्री कृष्णदास पयहारी जी थे।
टीला जी ने हाथ जोड़कर कहा –
“महाराज, यह गाय बाँझ है, इसने कभी दूध नहीं दिया।”
पयहारी जी ने मुस्कराकर गाय की पीठ पर हाथ फेरा और कहा –
“माता, भूख लगी है, कृपा कर दूध दो।”
अद्भुत! उस गाय के थनों से दूध बहने लगा। टीला जी ने श्रद्धा से दूध दुहकर पयहारी जी को दिया। संत ने शेष दूध प्रसाद रूप में उन्हें दिया।
ज्यों ही टीला जी ने वह प्रसाद पिया, उन्हें सिद्धियाँ प्राप्त हो गईं।
दीक्षा का अद्भुत प्रसंग
धीरे-धीरे टीला जी की ख्याति फैलने लगी। अनेक संत उन्हें शिष्य बनाना चाहते थे, परंतु जब भी कोई तुलसी की माला पहनाने का प्रयास करता, जिस टीले पर वे बैठे होते, वह आकाश की ओर उठ जाता। संत नीचे रह जाते और टीला ऊपर चला जाता।
यह देखकर साधु समाज चिंतित हुआ। अंततः संतों ने श्री पयहारी जी से प्रार्थना की –
“महाराज, आप ही इन्हें शिष्य बना सकते हैं।”
पयहारी जी टीला जी के पास आए। उन्हें देखते ही टीला जी ने पहचान लिया कि ये वही संत हैं जिन्होंने बाँझ गाय को दुग्धमयी बनाया था।
पयहारी जी बोले –
“बेटा, क्या तुम मेरे शिष्य बनोगे? श्रीराम मंत्र की दीक्षा लोगे?”
टीला जी ने कहा –
“हाँ, यदि कोई सामर्थ्यवान गुरु मिलेगा तो शिष्य बनूँगा।”
तभी पयहारी जी ने आचमन कर चंदन घिसना प्रारंभ किया। उसी क्षण टीला ऊपर उठने लगे, लेकिन पयहारी जी भी उतनी ही ऊँचाई तक बढ़ते गए। अंततः उन्होंने आदेश दिया –
“ठहर जा!”
सिद्धि ठहर गई। टीला जी ने समर्पण कर दिया।
पयहारी जी ने उन्हें राममंत्र की दीक्षा दी और नया नाम दिया –
“श्री साकेतनिवासाचार्य।”
भक्ति और सेवा का मार्ग
गुरुदेव से दीक्षा पाकर टीला जी ने जीवन को पूरी तरह भक्ति और सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि –
“सच्चा भजन केवल जप और ध्यान नहीं है, बल्कि संतों और गौ माता की सेवा है।”
वे अपने गुरु की आज्ञा से भारतभर में तीर्थयात्राएँ करते और लोगों को भक्ति का संदेश देते रहे।
प्रयागपुरा का भजन-स्थान
राजस्थान के प्रयागपुरा गाँव के पास उनका स्थायी भजन-स्थान है। चारों ओर रेतिला क्षेत्र, पानी की कमी और कहीं-कहीं खेजड़ी के पेड़। एक ऊँचे टीले पर विशाल पीलू का वृक्ष था। उसी वृक्ष के नीचे गुफा में टीला जी भजन किया करते थे।
अंतर्ध्यान होने से पहले उन्होंने कहा –
“जब तक यह पीलू वृक्ष हरा-भरा रहेगा, समझना कि मैं यहीं भजन कर रहा हूँ। जब यह सूख जाएगा, तब जानना कि मैं साकेतधाम चला गया हूँ।”
विरासत और शिक्षा
आज भी योग्य भक्तों को श्री टीला जी और उनके गुरुदेव पयहारी जी के दर्शन होते हैं। उनकी दो परंपराएँ चलीं –
गृहस्थ परंपरा
विरक्त परंपरा
दोनों परंपराओं से महान संतों ने जन्म लिया और भक्ति का प्रचार किया।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि –
केवल साधना से नहीं, बल्कि सद्गुरु की शरण से ही पूर्णता मिलती है।
संत और गौ सेवा ही वास्तविक भक्ति है।
और सबसे बड़ा सत्य – समर्पण ही सर्वोच्च सिद्धि है।
✨ इस प्रकार श्री टीला जी महाराज की कथा हमें न केवल प्रेरित करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि जीवन का असली लक्ष्य है – भक्ति, सेवा और सद्गुरु की शरणागति।
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