जब श्रीराम नाम ने माथे की लकीरों को बदल दिया
भगवान के नाम की महिमा और शक्ति असीम है, जो केवल पापों को ही नहीं मिटाती, बल्कि मनुष्य के कठोर प्रारब्ध (कर्मफल) को भी बदलने का सामर्थ्य रखती है। यह कथा श्री रामदास जी महाराज (‘करुणा निधान वाले बाबा’) के जीवन से जुड़ी एक अद्भुत घटना है, जो इस परम सत्य का प्रमाण है।
पंजाब के होशियारपुर जिले में श्री अमृतानंद भृगु शास्त्री नामक एक उच्च कोटि के पंडित निवास करते थे। वे भृगु संहिता के गहन ज्ञाता थे और उनकी गणनाएँ कभी गलत नहीं होती थीं। एक दिन उन्होंने अपनी स्वयं की जन्म पत्रिका का विचार किया तो भृगु संहिता के अनुसार लगभग बारह दिन बाद उनकी मृत्यु की तिथि निकली। उन्होंने अपने ज्ञान पर पूरा विश्वास रखते हुए, बार-बार गणनाएँ कीं, पर हर बार वही तिथि सामने आई।
अपनी आसन्न मृत्यु को जानकर, उन्होंने वृंदावन से कुछ सिद्ध महात्माओं को श्री रामचरितमानस का पाठ करने के लिए बुलाया। महात्माओं की उस मंडली में श्री रामदास जी महाराज, जो करुणा निधान वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे, भी थे।
पाठ आरंभ हुआ। पहले दिन ही एक चौपाई का पाठ किया गया, जिसे सुनकर पंडित जी के मन में एक गहरा प्रश्न उत्पन्न हुआ। चौपाई थी:
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के॥
अर्थात, “श्री राम का नाम एक ऐसी महामणि है जो विषय रूपी सर्प के विष को उतार देती है और माथे पर लिखे हुए कठिन तथा बुरे प्रारब्ध को भी मिटा देती है।”
पाठ पूरा होने पर पंडित जी ने करुणा निधान वाले महाराज जी से पूछा, “महाराज, रामायण की इस चौपाई में तो लिखा है कि श्रीराम का नाम माथे पर लिखे बुरे प्रारब्ध को भी मिटा सकता है। पर मेरी भृगु संहिता के अनुसार जो लिखा है, वह होकर रहता है। फिर गोस्वामी तुलसीदास जी ने ऐसा कैसे लिख दिया?”

महाराज जी ने पंडित जी के प्रश्न को शांत भाव से सुना और अत्यंत दृढ़ता से उत्तर दिया, “पंडित जी, भृगु संहिता में लिखी बातें बिल्कुल ठीक होती हैं, परंतु श्रीराम का नाम उन सबसे ऊपर है। मानस जी का एक-एक अक्षर परम सत्य है।”
उन्होंने आगे कहा, “यदि नाम की कृपा हो जाए, तो तुम्हारी आयु बढ़ सकती है। मेरा अपने राम नाम पर पूर्ण विश्वास है। तुम बस पूरी निष्ठा के साथ श्रीराम नाम का जप करो।”
महाराज जी की बात सुनकर, पंडित जी के मन में आशा की एक किरण जगी। उन्होंने तुरंत अखंड राम नाम के जप का संकल्प ले लिया। उन्होंने भगवान से कहा, “हे राम! यदि मैं सच में बच गया, तो सब कुछ छोड़कर केवल आपके नाम का ही आश्रय लूँगा।”
पंडित जी ने अपनी सारी चिंता छोड़कर बड़ी निष्ठा और लगन से राम नाम का जप करना शुरू कर दिया। इस तरह उनकी मृत्यु की निश्चित तिथि आ गई। उनका मन थोड़ा विचलित हुआ, पर वे राम नाम जपते रहे। उन्हें लगा कि अब उनके प्राण छूट जाएँगे, परंतु उस दिन कुछ भी नहीं हुआ। वह दिन सामान्य दिनों की तरह ही बीत गया।
इस घटना के बाद, पंडित अमृतानंद भृगु शास्त्री ने अपना संकल्प पूरा किया। उन्होंने अपना सारा ज्ञान और सांसारिक व्यवहार छोड़ दिया और अपना जीवन केवल श्री राम नाम और राम कथा के रसपान में लगा दिया। इस तरह जो पंडित जी बारह दिन में मरने वाले थे, वे उस घटना के बाद बारह साल तक जीवित रहे।
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान का नाम समस्त प्रारब्धों और प्रारब्ध जनित दुखों से परे है। जहाँ भाग्य की लकीरें समाप्त हो जाती हैं, वहाँ से नाम की महिमा का आरंभ होता है।
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