श्री प्रभोदानन्द सरस्वती जी का जीवन और साधना
श्री गौड़ीय वैष्णव परंपरा में अनेक संत हुए हैं, जिनमें से एक विशेष नाम है – श्री प्रभोदानन्द सरस्वती जी। वे मूलतः एक विद्वान संन्यासी, भक्त कवि और गहन साधक थे। उनका जीवन केवल भगवान के नाम-स्मरण, भजन और साधना को ही समर्पित था।
उनकी साधना का मूल आधार था – श्री युगल स्वरूप की उपासना। उनका दृढ़ मत था कि यदि केवल श्रीकृष्ण की ही पूजा की जाए और श्री राधा जी को भुला दिया जाए तो वह भक्ति अधूरी है। राधा और कृष्ण दोनों मिलकर ही पूर्णत्व को प्रकट करते हैं।
भजन और श्रीकृष्ण का दर्शन
एक दिन प्रभोदानन्द जी गहन भजन में लीन थे। वे हरे कृष्ण महामंत्र का जप कर रहे थे –
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
जप के दौरान उनके चारों ओर वातावरण में एक दिव्य परिवर्तन आने लगा। तुलसी और चंदन की मधुर सुगंध फैल गई और ध्यान की गहराई में एक नीली ज्योति प्रकट हुई। यह संकेत था कि कोई अलौकिक अनुभूति होने वाली है। जब उन्होंने नेत्र खोले तो देखा – सामने स्वयं श्रीकृष्ण खड़े हैं।
संवाद और भावप्रकाश
श्रीकृष्ण ने कहा –
“हे प्रभोदानन्द! तुम्हारे भजन से मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ, इसलिए तुम्हें दर्शन देने आया हूँ।”
इस पर प्रभोदानन्द जी ने हाथ जोड़कर बड़े विनम्र भाव से उत्तर दिया –
“प्रभु! क्या हमारा भजन इसलिए है कि हमें आपका दर्शन प्राप्त हो? यदि हम ऐसा सोचेंगे तो यह तो अपने लिए स्वार्थ हो जाएगा। असली भजन तो अपनी स्वामिनी, श्री राधा जी को सुख पहुँचाने के लिए है। यदि आप मेरे पास आए हैं, तो सोचिए मेरी प्रिय स्वामिनी को कितना विरह सहना पड़ रहा होगा। आपके एक क्षण के विलग से ही वे व्याकुल हो जाती हैं। फिर जब आप इतने समय मेरे पास हैं तो उनका हृदय कितना व्याकुल होगा।”
उनके इस निष्काम प्रेम और निस्वार्थ भक्ति भाव से श्रीकृष्ण बहुत प्रभावित हुए।
युगल स्वरूप का दर्शन
प्रभोदानन्द जी ने आगे कहा –
“हे प्रभु! यदि आप दर्शन देना ही चाहते हैं, तो कृपया युगल रूप में, अर्थात् श्री राधा-कृष्ण दोनों के रूप में दर्शन दें। मैं अकेले श्रीकृष्ण का दर्शन कभी नहीं करना चाहता। मेरे लिए तो प्रियाजी का सुख ही सर्वोपरि है।”
श्रीकृष्ण ने यह गूढ़ और अनन्य भक्ति भाव सुना तो वे अत्यंत प्रसन्न हो गए। तभी वहाँ श्री राधा और श्रीकृष्ण दोनों युगल रूप में प्रकट हुए। उस दिव्य युगल दर्शन का अनुभव प्रभोदानन्द जी के लिए अमूल्य और जीवन का सर्वोच्च क्षण बन गया। दर्शन देकर वे आशीर्वाद देते हुए अंतर्धान हो गए।
सिद्धांत और शिक्षा
इस प्रसंग से हमें गहरी शिक्षा मिलती है।
युगल स्वरूप की उपासना
प्रभोदानन्द जी का स्पष्ट मत था कि अकेले श्रीकृष्ण की उपासना अधूरी है। जब तक उसमें राधा जी का संग नहीं होता, तब तक वह पूर्ण नहीं हो सकती। यह सिद्धांत गौड़ीय वैष्णव दर्शन का मूल है।
निष्काम भक्ति
उन्होंने यह भी बताया कि भजन का उद्देश्य केवल दर्शन या कोई फल प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। असली भक्ति वह है जिसमें हम अपने सुख की नहीं, बल्कि श्री राधा-कृष्ण के सुख की चिंता करें। यही परम प्रेम है।
शास्त्रीय प्रमाण
गोपाल सहस्त्रनाम में भी भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं –
“गौरतेजो बिना यस्तु श्यामतेजः समर्चयेत्, जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे ॥”
अर्थात् – जो श्री राधा (गौरतेज) को अलग रखकर केवल श्रीकृष्ण (श्यामतेज) की उपासना करता है, वह पाप का भागी बनता है।
गूढ़ तात्पर्य
श्री प्रभोदानन्द जी की कथा केवल एक संत की लीला नहीं है, बल्कि यह हमें यह बताती है कि –
भक्ति केवल आत्मिक सुख के लिए नहीं, बल्कि भगवान के सुख के लिए होनी चाहिए।
जब हम ‘मैं’ और ‘मेरा’ भाव छोड़कर ‘तुम्हारा’ भाव अपनाते हैं, तभी असली भक्ति का जन्म होता है।
श्री राधा और श्रीकृष्ण दोनों का मिलन ही दिव्य प्रेम की पूर्णता है। केवल श्रीकृष्ण या केवल श्रीराधा की भक्ति में अधूरापन रह जाता है।
निष्कर्ष
श्री प्रभोदानन्द सरस्वती जी का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा भक्त अपने लिए कुछ नहीं चाहता। उसका मन, वचन और आचरण केवल भगवान और उनके सुख में ही रमा रहता है।
उनके भाव के अनुसार –
जो भक्त केवल श्रीकृष्ण का दर्शन चाहता है, वह अभी भी ‘स्वार्थ’ के स्तर पर है।
लेकिन जो भक्त राधा जी के सुख के लिए साधना करता है, वही परम निष्काम भक्त है।
इसलिए हमें भी अपनी साधना और भजन में इस भाव को अपनाना चाहिए कि –
“हे प्रभु! हम आपके दर्शन, आपके सुख या अपने सुख की चिंता नहीं करते। हमें केवल यह चाहिए कि हमारी भक्ति से आपकी प्रिया जी प्रसन्न हों और आप दोनों युगल रूप में आनंदित रहें।”
यही प्रभोदानन्द जी की भक्ति का सार है और यही उनकी अमूल्य शिक्षा है।
👉 इस प्रकार श्री प्रभोदानन्द सरस्वती जी की कथा और उनकी भक्ति का दर्शन हमें एक अत्यंत गहरा संदेश देती है – युगल स्वरूप की उपासना, निष्काम प्रेम और भगवान के सुख को ही अपना लक्ष्य बनाना।
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