श्री भक्तमाल श्री मोहनप्रिया दास जी
निष्ठा से भजन करने वालो के पास प्रारब्ध भी आज्ञा लेकर आता है –
श्री राधाकुंड के पास एक संत रहते थे श्रीमोहनप्रिया दास बाबा । राधाकुंड श्री जी का निज केली स्थल है ऐसी भावना से सेवा करते थे । श्री राधाकुंड मे पूरी सीढ़ियों पर सोहनी लगाते । कही कोई कुछ डाल देता या कोई चीज कुंड को खराब करती दिखे, उसको साफ कर देते ।
एक दिन उनके सामने एक काला पुरुष आया । उसने कहा – बाबा ! मुझे स्वीकार करो, मै तुम्हारा अशुभ प्रारब्ध हूं । बाबा बोले – क्या अशुभ लेकर आये हो ? उसने कहा – १२ वर्ष के भयंकर गलित कुष्ट रोग के रूप मे आऊंगा।
जिनको इसी जन्म मे भगवत्प्राप्ति होनी होती है उनके अनंत जन्मों का हिसाब ठाकुर जी कुछ रोग, व्याधि या कष्ट देकर भुगवा लेते है और उनको अपने पास बुला लेते है । बाबा ने कहा – मेरे पास १२ वर्ष का समय नही है । मेरा संत सेवा, राधाकुंड सेवा का नियम है । यदि १२ वर्ष कुष्ट होगा तो सेवा छूट जाएगी । तुमको मै स्वीकार नही कर सकता । अगले दिन बाबा भजन कर रहे थे तो वह काला पुरुष पुनः आया ।
उसने कहा देखो बाबा ! प्रारब्ध भोग है, स्वीकार तो करना ही पड़ेगा । मै ऐसा करता हूं की रातदिन कष्ट भुगवाकर छह वर्ष मे पूरा कर दूंगा । बाबा ने कहा छह वर्ष का भी समय मेरे पास नही । मै तुम्हे स्वीकार नही कर सकता । इस तरह वह काला पुरुष रोज आकर कहता की मुझे स्वीकार करो । एक दिन बोला – बाबा ! कम से कम २४ घंटे के लिए तो प्रारब्ध भोगना ही पड़ेगा । बाबा ने कहा ठीक है । उस काल पुरुष ने कहा – बाबा आप कोई दवा नही लेना ।
बाबा बोले ठीक है नही लेंगे । बाबा ने उस काल पुरुष से कहां की कल सुबह तुम आना । बाबा ने अपने शिष्यों से कहा की काल सुबह से मै कोई विशेष अनुष्ठान कर रहा हूं, कोई भी २४ घंटा मेरी कुटिया के भीतर प्रवेश नही करना, मै कितना भी चीख मचाऊं ध्यान नही देना और पास नही आना ।
जैसे ही सुबह बाबा कुटिया मे जाकर बंद हुए वैसे ही पूरे शरीर पर कुष्ट हो गया । अगले दिन पुनः बाबा का शरीर स्वस्थ हो गया । बारह वर्ष का प्रारब्ध चौबीस घंटे मे निकल गया । जो साधक व महात्मा निष्ठा से भजन करते है उनको प्रारब्ध भी पूछ कर आता है । उसको बड़े बड़े कष्ट और रोग भी थोड़ा कष्ट देकर निकल जाते है ।
Shri Bhaktmal Shri Mohanpriya das Ji
यह कथा “निष्ठा से भजन करने वालों के पास प्रारब्ध भी आज्ञा लेकर आता है” — एक अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को उजागर करती है। यह केवल किसी संत की महिमा नहीं, बल्कि भगवत्प्रेम और सेवा की निष्ठा का ऐसा उदाहरण है जो साधकों को यह दिखाता है कि जब मनुष्य पूर्ण समर्पण से भजन करता है, तो कर्म के बंधन भी झुक जाते हैं।
🔱 कथासार का भावार्थ:
श्री मोहनप्रिया दास बाबा — राधाकुंड के प्रति इतने समर्पित थे कि उनकी सेवा भावना ही उनकी साधना थी। राधारानी की लीलाभूमि को उन्होंने भगवत्स्वरूप मानकर तन, मन और समय समर्पित कर दिया था।
जब प्रारब्ध (काला पुरुष) उनके पास आता है, तो वह आज्ञा लेकर आता है। यह कोई सामान्य बात नहीं — यह सिद्ध करता है कि:
उनके जीवन की डोर अब स्वयं भगवान के हाथ में थी,
प्रारब्ध भी उनके संकल्प और अनुमति पर निर्भर था।
🌺 प्रमुख शिक्षाएँ:
1. निष्ठा और भजन से प्रारब्ध का प्रभाव क्षीण होता है
सामान्यजन को जहाँ प्रारब्ध मजबूरी में भोगना पड़ता है, वहीं भक्त के पास वह “पूछकर आता है”। क्योंकि उसकी चेतना अब भौतिक कर्मबन्धनों से ऊपर उठ चुकी होती है।
2. भजन और सेवा एक रक्षा-कवच बन जाते हैं
बाबा ने कहा, “मेरे पास सेवा का नियम है, मैं कुष्ठ रोग नहीं भोग सकता।” यह वचन उस स्थिति से आता है जहाँ सेवा ही जीवन का केंद्र बन चुकी हो। ऐसे जीवन को भगवान स्वयं सुरक्षा प्रदान करते हैं।
3. प्रारब्ध को संकल्प से छोटा किया जा सकता है
बारह वर्षों का कुष्ठ २४ घंटे में समाप्त हो गया — यह साधक के संकल्प, भजनबल और त्याग का परिणाम है।
4. शरीर नहीं, सेवा की अखंडता मायने रखती है
बाबा को शरीर की चिंता नहीं थी, चिंता थी सेवा और नियमों की। यह सच्चा वैराग्य और प्रेम है।
🔔 आज के साधकों के लिए संदेश:
जब तक हम भजन को “एक क्रिया” मानते रहेंगे, तब तक प्रारब्ध हम पर शासन करेगा।
जब भजन “स्वरूप” बन जाए — जब सेवा जीवन बन जाए — तब प्रारब्ध भी दया की मुद्रा में आकर अनुमति मांगता है।
यह कथा प्रेरणा देती है कि यदि भजन निष्ठापूर्वक, अखंड भाव से किया जाए, तो भगवान और उनका विधान — दोनों हमारे जीवन को दिव्यता से भर देते हैं।
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