श्री भक्तमाल – ४०: श्री मधुसूदन सरस्वती | Shri Bhaktmal Ji – 40

shri bhaktmal Sri Madhusudan Saraswati

तत्वज्ञान से प्रेमभाव की ओर यात्रा


श्री मधुसूदन सरस्वती, एक महान अद्वैत वेदांती और प्रकांड विद्वान थे। काशी के विद्वानों में उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता था। वे इतने योग्य थे कि उन्हें शंकराचार्य का पद मिलने वाला था। अपने जीवन में वे ‘मधुकरी’ (भिक्षा) मांगकर रहते थे और उनका नियम था कि वे केवल एक घर से ही भिक्षा लेते थे। यदि उस घर से कुछ मिल गया, तो ठीक; अन्यथा वे दूसरे घर नहीं जाते थे।

ज्ञान से प्रेम की ओर मोड़

एक दिन, वे ब्रज में एक ग्वालिन के दरवाजे पर गए। वह ग्वालिन चूल्हे पर रोटियाँ बना रही थी और उसकी गोद में उसका छोटा बच्चा बैठकर माखन-रोटी खा रहा था। बाबा को देखकर, उसने तुरंत अपने बच्चे को बगल में रखा और उनके पात्र में एक रोटी डाल दी। स्वामी जी ने देखा कि उस रोटी पर ग्वालिन की साड़ी का स्पर्श हुआ था और साड़ी पर बच्चे का मल लगा हुआ था।

उनकी बुद्धि में तुरंत द्वंद्व उठा। वे आँखें बंद करके सोचने लगे, “अरे! यह रोटी अपवित्र है, इसे वापस भी नहीं कर सकता और इसे खा भी नहीं सकता।”

जब उन्होंने आँखें खोली, तो सामने का दृश्य देखकर वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने देखा कि स्वयं बालकृष्ण उस ग्वालिन के आँगन में बैठे हैं और उस ग्वालिन के बच्चे के मुख की जूठी माखन-रोटी छीनकर खा रहे हैं। इस अद्भुत दृश्य ने उनके ज्ञान को चुनौती दे दी। वे समझ गए कि ब्रज की यह ग्वालिन कोई साधारण स्त्री नहीं है और यहाँ का भाव सामान्य नहीं है। उनका सारा तत्वज्ञान एक पल में धरा रह गया।

स्वामी जी वहीं उस ग्वालिन के सामने ब्रज की रज में लोटने लगे। उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब वे काशी लौटकर नहीं जाएँगे। वे यहीं ब्रज में गोपियों की दासी बनकर इस पवित्र रज में पड़े रहेंगे।

छह महीने बीत गए। स्वामी जी रोज़ यमुना में स्नान करते, गोपियों की चरण रज माथे पर लगाते और स्वयं को गोपियों की दासी मानकर पागलों की तरह रज में लेटे रहते। उनके शिष्य उन्हें ढूँढ़ते हुए वृंदावन पहुँचे। जब उन्होंने अपने गुरु की यह अवस्था देखी, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने स्वामी जी से कहा, “आप जैसे तत्वज्ञानी महापुरुष, वेदांत के ज्ञाता, ऐसे पागलों की तरह रज में क्यों लेटे रहते हैं? आपका तत्वज्ञान कहाँ चला गया?”

शिष्यों के इस प्रश्न के उत्तर में, स्वामी जी ने एक श्लोक बोला:

वंशी विभूषित करात्, नवनीरद आभात्,

पीताम्बरात्, अरुणबिंबफल अधरोष्ठात् ।

पूर्णेन्दु सुंदर मुखात्, अरविंद नेत्रात्,

कृष्णात्, परम किम् अपि तत्वम्, अहम् न जानि।।

अर्थात, “जिनके कर-कमलों में बंसी शोभायमान है, जिनके सुंदर शरीर की आभा नए बादलों जैसी घनश्याम है, जिनका सुंदर मुख पूर्ण चंद्रमा जैसा है, जिनके नेत्र कमल की भाँति सुंदर हैं, जिन्होंने पीताम्बर धारण किया है, जिनके अधर (होंठ) उदय होते हुए सूर्य के लाल फल के समान हैं, ऐसे श्रीकृष्ण भगवान के सिवा और कोई परम तत्व है, यह मैं नहीं जानता।”

शिष्यों ने फिर कहा, “शंकराचार्य का पद आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।”

स्वामी जी ने शांत भाव से कहा, “मुझे अब इस पद से क्या मतलब? भगवान ने कृपा करके मुझे गोपियों के चरण-कमलों की दासी बना दिया है। अब मैं ब्रज छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”

मधुसूदन सरस्वती के जीवन से जुड़ी अन्य बातें:

 

  • विद्वता और गुरु: श्री मधुसूदन सरस्वती अपने समय के सबसे बड़े विद्वानों में से एक थे। उन्होंने वाराणसी में श्रीरामतीर्थ और विश्वेश्वर सरस्वती जैसे महान आचार्यों से वेदांत और अन्य शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था।
  • ग्रंथ रचना: उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अद्वैतसिद्धि’ है, जिसमें उन्होंने अद्वैत वेदांत की स्थापना की है और द्वैतवाद का खंडन किया है। इसके अलावा उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता पर ‘गूढार्थ दीपिका’ नामक टीका भी लिखी है। इस टीका में उन्होंने भक्ति की श्रेष्ठता को स्थापित किया और यह सिद्ध किया कि भगवान कृष्ण ही परम सत्य हैं।
  • ब्रज और वृंदावन प्रेम: वृंदावन में प्रवेश के बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई। वे ज्ञान के मार्ग से हटकर प्रेम और भक्ति के मार्ग पर आ गए। उन्होंने ‘भक्तिरसायन’ और ‘भक्तिसामान्य निर्णय’ जैसे ग्रंथ भी लिखे, जिनमें उन्होंने भक्ति की महिमा का वर्णन किया। उनके जीवन का यह परिवर्तन दर्शाता है कि ज्ञान का अंतिम लक्ष्य प्रेम की प्राप्ति है।
  • अकबर से भेंट: ऐसा कहा जाता है कि वे सम्राट अकबर के समकालीन थे और अकबर ने उनके पांडित्य और ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें विशेष सम्मान दिया था।
  • मीमांसा पर विजय: उन्होंने मीमांसा के विद्वानों को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया था, जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी।

श्री मधुसूदन सरस्वती का जीवन हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग में ज्ञान का चरम बिंदु प्रेम है। बिना प्रेम के ज्ञान अधूरा है, और शुद्ध प्रेम के सामने सारे नियम और कर्मकांड गौण हो जाते हैं। ब्रज की पवित्र भूमि पर उन्हें यह परम सत्य मिला कि कृष्ण ही सब कुछ हैं।


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