श्री भक्तमाल २५ – श्री जयमल जी Sri Jaimal Ji | Shri Bhktmal Ji 25

श्री भक्तमाल २५ - श्री जयमल जी Sri Jaimal Ji

श्री जयमल जी का जीवन एवं भक्ति

राजस्थान की भूमि सदा से भक्तों, संतों और शूरवीरों की जन्मस्थली रही है। इन्हीं महापुरुषों में एक नाम आता है – राजा श्री जयमल जी, जो मेड़ता रियासत के राजा थे। बाहरी दृष्टि से वे एक राजसी जीवन जीने वाले शासक थे, परंतु आंतरिक रूप से वे भगवान के परम अनन्य भक्त थे। वे रसिकशिरोमणि श्री हितहरिवंश महाप्रभु जी के शिष्य थे और श्री राधा-माधव के प्रति उनकी गहरी आस्था थी।

यद्यपि उनके गुरुदेव ने उन्हें श्री राधाकृष्ण मंत्र प्रदान किया था, फिर भी उनकी व्यक्तिगत आराधना धनुषधारी भगवान श्रीराम (चारभुजा नाथ) की ओर अधिक केंद्रित थी। यह उनके जीवन की विशेषता थी कि वे शास्त्रीय मर्यादा और भक्ति-रस को एक साथ जीते थे।

जयमल जी ठाकुरजी की सेवा और पूजा में इतने अनुरक्त थे कि वे दिनभर के राजकीय कार्यों से भी अधिक समय ठाकुरजी की सेवा में लगाते। वे प्रतिदिन १० घड़ी (लगभग ४ घंटे) भजन-पूजन अवश्य करते। उनकी यह नियमबद्धता इतनी कठोर थी कि पूजा के समय कोई राजकीय संदेश, चाहे कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, वे नहीं सुनते थे। बल्कि जो व्यक्ति उस समय उनकी पूजा में व्यवधान डालता, उसे मृत्युदंड देने का विधान रखा गया था। इससे स्पष्ट है कि उनके लिए भगवान की सेवा ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य था।

पहला प्रसंग – भगवान श्रीराम का अद्भुत हस्तक्षेप

जयमल जी का एक भाई भी था, जो पास के राज्य मांडोवर का राजा था। वह महत्वाकांक्षी था और चाहता था कि किसी प्रकार जयमल का राज्य भी उसके अधीन आ जाए। जब उसे पता चला कि जयमल पूजा के समय किसी भी सूचना को ग्रहण नहीं करते, तो उसने एक दुष्ट योजना बनाई। उसने सोचा कि यदि पूजा के समय आक्रमण किया जाए तो कोई सूचना जयमल तक नहीं पहुँचेगी और राज्य को आसानी से जीत लिया जाएगा।

योजना के अनुसार उसने मेड़ता पर हमला कर दिया। राज्य पर संकट आया तो मंत्रियों ने विचार किया कि केवल राजमाता ही इस समय राजा को सूचना दे सकती हैं। राजमाता ने जाकर जयमल जी को बताया। तब भी जयमल जी ने बड़े धैर्य से उत्तर दिया – “भगवान श्रीराम सब भला करेंगे।”

इसी समय एक चमत्कारी घटना घटी। स्वयं श्री रघुनाथजी (श्रीराम) एक सिपाही का वेश धारण करके घोड़े पर सवार हुए। हाथ में तलवार और भाला लिया, पीठ पर ढाल बाँधी और युद्धभूमि में प्रवेश कर गए। वहाँ उन्होंने शत्रु की पूरी सेना को परास्त कर दिया, पर किसी का प्राण नहीं लिया। केवल घाव देकर सबको युद्ध से बाहर कर दिया। अंततः केवल शत्रु राजा (जयमल का भाई) ही शेष रह गया।

भगवान ने सोचा कि यह तो मेरे भक्त का ही भाई है, अतः इसका वध नहीं करना चाहिए। उन्होंने उसे अपने सुंदर रूप का दर्शन कराया। उस रूप के दर्शन से वह शत्रु मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। जब होश आया तो उसने कहा – “आपके पक्ष से केवल एक सांवला सिपाही आया था, जिसने तलवार से कम और अपनी मुस्कान व दृष्टि से अधिक घायल किया। उसके दर्शन मात्र से मैं बेहोश हो गया।”

यह सुनकर जयमल जी समझ गए कि वह सिपाही कोई और नहीं बल्कि स्वयं श्री रघुनाथजी थे। वे रोकर भगवान के चरणों में गिर पड़े। भाई ने भी भगवान के दर्शन की प्रार्थना की। जब जयमल ने पुकारा तो भगवान ने उसी रूप में दर्शन देकर शत्रु के हृदय का वैर मिटा दिया। भाई को पश्चाताप हुआ और वह भी भगवान का भक्त बन गया।

जयमल जी को इस घटना से अपार पीड़ा भी हुई। उन्हें लगा कि उनके एक वचन को पूर्ण करने के लिए भगवान को स्वयं युद्धक्षेत्र में उतरना पड़ा। यही एक सच्चे भक्त की निशानी है – भगवान की कृपा मिलने पर भी वह स्वयं को ही दोष देता है और विनम्र बना रहता है।

दूसरा प्रसंग – रानी को बालरूप दर्शन

जयमल जी केवल पूजा-पाठ में ही नहीं, बल्कि ठाकुरजी के आराम और सुविधा का भी ध्यान रखते थे। एक बार गर्मी के दिनों में वे विश्राम कर रहे थे। उन्हें विचार आया कि जब मुझे इतनी सुविधाएँ प्राप्त हैं – खस की तटिया, ठंडी हवाएँ, गीले पर्दे – तब भी मुझे गर्मी लग रही है, तो मेरे ठाकुरजी जो नीचे मंदिर में विराजमान हैं, वे कितनी गर्मी सहते होंगे?

इस विचार से उन्होंने छत पर एक सुंदर और हवादार कक्ष बनवाया। वहाँ ठाकुरजी के लिए शयन की व्यवस्था की और रात्रि में स्वयं फूलों से शय्या सजाते, इत्र, जल, पान, ताम्बूल आदि अर्पित करके नीचे उतर आते। वे सीढ़ी को अलग रख देते ताकि कोई और वहाँ न जा सके।

एक रात रानी को जिज्ञासा हुई कि राजा रात्रि में छत पर जाकर क्या करते हैं। उन्होंने चुपचाप सीढ़ी लगाई और ऊपर चली गईं। परदे को थोड़ा हटाकर देखा तो उनके सामने एक अत्यंत सुंदर सुकुमार किशोर बालक शयन कर रहा था। ऐसा अद्भुत स्वरूप उन्होंने जीवन में पहले कभी न देखा था। वे तुरंत सीढ़ी से उतर आईं और सब बात प्रातः राजा को बताई।

राजा ने रानी को डांटते हुए कहा कि फिर कभी ऐसा न करना, क्योंकि लालजी की नींद में बाधा पड़ सकती है। परंतु भीतर से वे प्रसन्न हुए कि रानी को भी भगवान के दिव्य रूप का दर्शन हो गया। उन्होंने समझा कि यह रानी के महान भाग्य का संकेत है।

निष्कर्ष

श्री जयमल जी की कथा यह सिद्ध करती है कि सच्चा भक्त केवल अपनी भक्ति में ही लीन नहीं होता, बल्कि वह भगवान के हर सुख-दुख को अपना मानता है। उनके लिए ठाकुरजी का आराम, सेवा, पूजा, भोग ही जीवन का सार है।

पहले प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान अपने भक्त की लाज रखने के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं। वहीं दूसरे प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि भगवान केवल भक्त को ही नहीं, बल्कि उनके परिवारजनों को भी अपनी कृपा से अनुग्रहित कर देते हैं।

राजा जयमल जी का जीवन भक्ति, त्याग और दिव्यता का ऐसा उदाहरण है, जो आज भी भक्तों को यह प्रेरणा देता है कि यदि हम पूर्ण समर्पण से भगवान का स्मरण करें, तो वे स्वयं हमारी रक्षा करते हैं और हमें अपने सान्निध्य का आनंद प्रदान करते हैं।

 


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