श्री भक्तमाल २७ – श्री हरिवंश देवाचार्य जी | Shri Bhaktmal Ji 27

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जब एक प्रेत को मिली परम वृंदावन की दिव्य प्राप्ति


श्री निम्बार्क संप्रदाय के महान रसिक संत श्री हरिवंश देवाचार्य जी महाराज की महिमा अपरंपार है। उनका जीवन युगल सरकार के नाम-जप और प्रेम में लीन रहता था। एक बार वे प्रेम और भक्ति के सागर में डूबे, ‘राधे कृष्ण’ का मधुर नाम-संकीर्तन करते हुए भरतपुर से गोवर्धन की ओर जा रहे थे।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे।

राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे।।

मार्ग में एक गाँव के पास उन्होंने एक विचित्र और हृदय विदारक दृश्य देखा। गाँव के कुछ लोग मिलकर एक युवक को जूतों और चप्पलों से बुरी तरह पीट रहे थे। युवक की दशा अत्यंत दयनीय थी, और वह दर्द से तड़प रहा था। श्री हरिवंश देवाचार्य जी का करुणा से भरा हृदय यह देखकर द्रवित हो उठा। वे तुरंत वहाँ रुके और लोगों से पूछा, “आप इस निर्दोष बालक को क्यों पीट रहे हैं?”

लोगों ने बताया, “महाराज, इस पर एक प्रेत चढ़ गया है। हम इसे गाँव की सीमा पर रहने वाले एक अघोरी के पास ले जा रहे हैं, जो तंत्र-मंत्र से इस प्रेत को उतारेगा। वह अघोरी अपने उपास्य देवता को मांस और शराब का भोग लगाता है।”

संत ने शांत भाव से कहा, “क्या मैं इस युवक पर चढ़ा हुआ भूत उतार दूँ?”

लोगों के चेहरे पर संशय और भय के भाव आ गए। उन्होंने कहा, “महाराज, आप तो आज इसका भूत उतारकर चले जाएंगे, लेकिन यदि उस अघोरी को यह पता चला तो वह हमसे नाराज़ हो जाएगा और फिर हमारे गाँव में किसी का भी प्रेत नहीं उतारेगा। यहाँ हर महीने किसी न किसी को प्रेत पकड़ लेता है।”

संत की आँखों में युवक के लिए गहरी करुणा थी। उन्होंने कहा, “यह युवक जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा है। यदि अभी इसका भूत नहीं उतारा तो यह मर भी सकता है। तुम उस अघोरी को मत बताना, पर मुझे इसका भूत उतारने दो।” उनकी निश्चल वाणी और शांत मुखमंडल देखकर गाँव वालों का हृदय पिघल गया और वे मान गए।

श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने बिना किसी मंत्र या तंत्र के, केवल अपनी साधना की शक्ति से युवक के माथे पर अपना दाहिना हाथ रखा और दृढ़ता से कहा, “यदि मैंने अपने संपूर्ण जीवन में श्री वृंदावन की उपासना सच्चे हृदय से की है, और मेरी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं है, तो यह प्रेत इस बालक को इसी क्षण छोड़ दे।

उनकी वाणी के चमत्कारी प्रभाव से वह प्रेत उसी क्षण देह से बाहर आया और सामने आकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसने करुण स्वर में कहा, “संत जी, आप मुझ पर कृपा करें! आपके दिव्य स्पर्श और दर्शन से मेरी जन्मों की पीड़ा शांत हो गई है। मैं इस प्रेत योनि में बहुत कष्ट पा रहा हूँ।”

संत ने पूछा, “तुम इन गाँव वालों को क्यों कष्ट देते हो?”

प्रेत ने अपनी दुखभरी कथा सुनाई, “उस अघोरी के मन में मांस और शराब की लालसा होती है। वह लोगों को इनका सेवन करने के लिए प्रेरित करता है। इन अपवित्र वस्तुओं के सेवन से लोगों का शरीर और मन अपवित्र हो जाता है, और ऐसे अपवित्र शरीर में मैं बहुत सरलता से प्रवेश कर जाता हूँ। इसी तरह वह अघोरी मुझसे अपनी इच्छाएँ पूरी करवाता है। मैंने जीवित रहते बहुत पाप किए थे, इसलिए इस योनि में पड़ा हूँ, पर एक बार संतों से मैंने श्री वृंदावन की महिमा सुनी थी। आप मुझ पर कृपा करें।”

संत ने पूछा, “तुम्हारे लिए मैं क्या कर सकता हूँ?”

प्रेत की आँखों में आशा की एक किरण जगी। वह बोला, “हे संत! आप जैसे रसिक संत की चरण रज ही मुझे वृंदावन की प्राप्ति करवा सकती है। आप कृपा करके अपने दाहिने चरण की रज मुझे प्रदान करें।”

पास खड़े लोग यह सुनकर हँसने लगे। उन्होंने प्रेत का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “अरे मूर्ख! तू इतना भी नहीं कर सकता? यहाँ झुककर स्वयं ही अपने हाथ से रज ले ले।”

तब प्रेत ने एक अत्यंत गहरी आध्यात्मिक शिक्षा दी, जिसने सभी को मौन कर दिया। उसने कहा, “दो प्रकार के व्यक्तियों को संतों की चरण रज प्राप्त नहीं हो सकती – एक अभिमानी और दूसरा पापी। अभिमानी व्यक्ति कभी संत के सामने झुकता नहीं और पापी व्यक्ति तो संत की किसी वस्तु का स्पर्श तक नहीं कर सकता। यदि संत अपनी ओर से कृपा करके रज देने की आज्ञा दें, तभी पापी को वह रज प्राप्त हो सकती है। मुझे अपने पापों के कारण रज लेने का अधिकार नहीं है। मुझे आपकी आज्ञा चाहिए।”

इस बात को सुनकर श्री हरिवंश देवाचार्य जी का हृदय करुणा से उमड़ पड़ा। उन्होंने अपना चरण उठाकर कहा, “इस पदरज को लेकर अपने मस्तक से लगा।”

जैसे ही प्रेत ने उनकी चरण रज अपने मस्तक से लगाई, एक अद्भुत चमत्कार हुआ। उसके प्रेत रूप का अंत हो गया और उसने तुरंत एक दिव्य, प्रकाशवान शरीर धारण कर लिया। उसके मुख पर एक दिव्य मुस्कान थी। उसने संत को प्रणाम किया और कहा, “आपकी कृपा से मैं श्री वृंदावन जा रहा हूँ।” ऐसा कहकर वह अदृश्य हो गया।

इस घटना ने गाँव के सभी लोगों को स्तब्ध कर दिया और उन्हें संत की असीम कृपा और शक्ति का अनुभव हुआ। यह कथा हमें दो महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:

  1. अपवित्र आहार और आचरण से व्यक्ति की चेतना कमजोर हो जाती है और वह नकारात्मक शक्तियों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
  2. पाप और अहंकार व्यक्ति को भक्ति के मार्ग से दूर कर देते हैं, और सच्चे संत की कृपा ही उस मार्ग को पुनः खोल सकती है।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे।

राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे।।

(वृंदावन के एक रसिक संत के द्वारा मुझ दास को सुनाया गया यह प्रसंग लिखने का प्रयास किया है। भूल-चूक क्षमा करें।)

 


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