श्री भक्तमाल २१ -श्री गणेशदास भक्तमाल जी | Shri Bhaktmal – 21

श्री भक्तमाल २१ – श्री गणेशदास भक्तमाल जी Sri Ganeshdas Ji

आपने श्री भक्तमाल के २१वें प्रसंग – श्री गणेशदास भक्तमाली जी का जीवन परिचय साझा किया है। यह प्रसंग अत्यंत प्रेरणादायी और भावपूर्ण है, जिसमें संत की विनम्रता, प्रभु की कृपा, महाभाव की स्थिति और सिद्धि पर विजय के कई अद्भुत प्रसंग हैं। आइए इसे ८०० शब्दों के विस्तृत विवरण में समझते हैं।


१. श्री रामराजा सरकार की कृपा

बाबा गणेशदास जी जब विद्यार्थी जीवन पूरा करके साधना की ओर बढ़े तो वे विंध्याचल और चित्रकूट में कुछ समय रहे। आगे ओरछा की ओर बढ़ते हुए वे जंगलों में भटक गए। लगातार तीन दिन भूखे रहने पर उनकी स्थिति दयनीय हो गई। बेतवा नदी के तट पर बैठकर उन्होंने मिट्टी खाकर और जल पीकर स्वयं को संभाला और भजन में बैठ गए।

उसी समय एक वैष्णव स्वरूप में स्वयं श्री रामराजा सरकार प्रकट हुए और पंडित राजाराम कहकर उन्हें अपने घर भोजन के लिए ले गए। एकादशी और द्वादशी दोनों दिन उन्हें प्रसाद पवाया और उनकी भूख मिटाई। बाद में जब गणेशदास जी ने ओरछा में जाकर उस पंडित का घर ढूँढना चाहा तो किसी को कुछ पता न था। मंदिर के पुजारी ने रहस्य खोला कि वे कोई साधारण पंडित नहीं, बल्कि स्वयं रामराजा सरकार थे जिन्होंने अपने भक्त की रक्षा और सेवा की। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि सच्चे भक्त के लिए प्रभु स्वयं मार्गदर्शन करते हैं।


२. भक्तमाल की विस्तृत व्याख्या

श्री गणेशदास जी का दूसरा महान योगदान भक्तमाल ग्रंथ की व्याख्या है। जब संतजनों के बीच यह विचार आया कि इस महान ग्रंथ की विस्तृत व्याख्या होनी चाहिए, तो गणेशदास जी और श्री रामेश्वरदास जी को बुलाया गया।

घटना यह है कि सुदामा कुटी में संतो का भंडारा आयोजित था। जब गणेशदास जी वहाँ पहुँचे तो कोतवाल बाबा ने उन्हें पहचान न पाया और सामान्य व्यक्ति समझकर पंगत से बाहर कर दिया। गणेशदास जी ने अपमान का जरा भी बुरा न माना और बाहर सड़क पर लीलानंद ठाकुर के साथ खिचड़ी का प्रसाद पाया।

जब वे बाद में भीतर गए तो संतजनों ने उनसे पूछा कि आपने प्रसाद कहाँ पाया, तब उन्होंने बड़े प्रेम से उत्तर दिया – “सम्पूर्ण ब्रजभूमि सच्चिदानंदमयी है, यहाँ कोई स्थान अपवित्र नहीं। जहाँ भी संत बुलाएँ, वही प्रसाद है – चाहे सड़क हो या मंदिर।”

उनकी इस सरलता और उच्च दृष्टिकोण को देखकर संतजनों ने निश्चय किया कि केवल यही संत इस महान ग्रंथ की व्याख्या करने के योग्य हैं। इसके बाद उनके द्वारा भक्तमाल की विस्तृत व्याख्या चार खंडों में हुई, जो आज भी प्रकाशित और पूजनीय है।


३. सिद्ध योगी पर कृपा

उत्तराखंड के एक सन्यासी महात्मा, जिनके भीतर विशेष सिद्धि प्रकट हो गई थी, गणेशदास जी के पास आए। उन्हें सामने वाले व्यक्ति का भूत, भविष्य और वर्तमान दिख जाता था। प्रारंभ में यह उन्हें अद्भुत लगा, परंतु धीरे-धीरे यह सिद्धि उनके लिए दुःख का कारण बन गई। जब भी वे किसी को देखते, उसके दोष और पाप भी प्रकट हो जाते, जिससे उनके मन में या तो घृणा या ईर्ष्या उत्पन्न होने लगती।

वे रोते हुए गणेशदास जी से बोले कि उन्हें इस सिद्धि से मुक्ति चाहिए और सर्वत्र केवल भगवान ही दिखाई दें। गणेशदास जी ने विनम्रता से कहा – “हम तो सामान्य व्यक्ति हैं, हमारे पास कोई सामर्थ्य नहीं।” लेकिन जब योगी ने उनके चरण पकड़कर प्रार्थना की, तब गणेशदास जी ने उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उसी क्षण उनकी सिद्धि नष्ट हो गई और उनकी दृष्टि भगवानमयी हो गई।

यह प्रसंग बताता है कि सिद्धियाँ कभी-कभी साधक के मार्ग की बाधा बन जाती हैं। सच्चे संत की कृपा ही साधक को भगवद-दृष्टि प्रदान कर सकती है।


४. महाभाव की अवस्था

बरसाना धाम में श्री गणेशदास जी जब श्रीमद्भागवत कथा सुना रहे थे, उस समय उन्होंने प्रेमसरोज के प्रसंग का वर्णन किया – जब रानी बरसाने से श्रीलालजी के दर्शन के लिए और नंदगांव से श्रीकृष्ण प्रिया जी चलकर आती हैं और मार्ग में दोनों की दृष्टि मिलती है।

यह सुनाते-सुनाते गणेशदास जी महाभाव की अवस्था में चले गए। उनका शरीर थरथर काँपने लगा, आँखों से आँसू झरने लगे और वे कथा आगे न कह पाए। बाद में अपने शिष्यों से उन्होंने कहा – “हमें कथा कहते समय बहुत सावधानी रखनी पड़ती है, क्योंकि यदि भावरस स्पर्श कर जाए तो फिर संसार की सुध-बुध समाप्त हो जाती है।”

उनकी यह स्थिति श्री गौड़ीय परंपरा के महान संत जगद्बंधु सुंदर जी से मिलती-जुलती थी। जिनके सामने यदि ‘राधा’ नाम भी निकल जाता, तो वे कई दिनों तक महाभाव में डूब जाते। यह अवस्था दर्शाती है कि गणेशदास जी केवल विद्वान नहीं, बल्कि वास्तविक रसिक भक्त थे।


५. हनुमान जी द्वारा प्रसाद पाना

एक बार जब गणेशदास जी का उत्सव चल रहा था, तो वहाँ एक अवधूत संत प्रसाद पाने पहुँचे। जब उनसे पूछा गया कि आप यहाँ कैसे आए, तो उन्होंने बताया – “मैं यमुना किनारे भजन कर रहा था, तभी मुझे हनुमान जी जाते दिखे। जब मैंने उनसे पूछा कि कहाँ जा रहे हैं, तो उन्होंने कहा – बाबा गणेशदास जी के उत्सव में प्रसाद पाने। तब मैं भी यहाँ आ गया।”

उन्होंने यह भी कहा कि जो संत उनके सामने प्रसाद पा रहे थे, वे वास्तव में हनुमान जी ही थे। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि गणेशदास जी का उत्सव केवल मानव समाज तक सीमित न था, बल्कि देवता और महापुरुष भी उसमें सम्मिलित होकर आशीर्वाद प्राप्त करते थे।


निष्कर्ष

श्री गणेशदास भक्तमाली जी का जीवन कई दृष्टियों से अनुकरणीय है। उनकी सरलता, विनम्रता और हर परिस्थिति में प्रभु की कृपा को पहचानने की क्षमता अद्वितीय है।

  • उन्होंने दिखाया कि सच्चे भक्त के लिए प्रभु स्वयं भोजन, निवास और रक्षा की व्यवस्था करते हैं।

  • उन्होंने अपमान को सहन कर उसे भी ईश्वर की इच्छा माना।

  • उन्होंने यह शिक्षा दी कि संसार में कोई भी भूमि अपवित्र नहीं, सब ईश्वरमय है।

  • उन्होंने सिद्धि जैसी शक्ति को भी त्यागकर भगवद-दृष्टि को सर्वोपरि माना।

  • उनकी कथाओं में रस और भाव इतना गहरा था कि वे स्वयं उसमें डूब जाते थे।

  • और उनके उत्सवों में देवता स्वयं प्रसाद ग्रहण करने आते थे।

इस प्रकार श्री गणेशदास जी का जीवन भक्ति, विनम्रता, करुणा और भगवद-कृपा का अद्वितीय उदाहरण है, जो आज भी साधकों को मार्गदर्शन देता है।

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