श्री भक्तमाल कथा : श्री देवदास पहाड़ी बाबा
भारत की संत परंपरा में ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं, जिनके जीवन से भक्तों को यह शिक्षा मिलती है कि जब मनुष्य अपने जीवन में कठिनाइयों से घिर जाता है और सभी सांसारिक उपाय निष्फल हो जाते हैं, तब संतों की शरण ही वास्तविक आश्रय होती है। वृंदावन के खाकचौक में विराजमान श्री देवदास पहाड़ी बाबा ऐसे ही सिद्ध संत थे। उनकी वाणी कठोर अवश्य थी, लेकिन उसमें सत्य और कृपा का अद्भुत सामंजस्य था। उनके जीवन के अनेक चमत्कारिक प्रसंग आज भी भक्तों के हृदय को आश्वस्त करते हैं।

पहला प्रसंग : संतानहीन दंपत्ति को संतान प्राप्ति
दिल्ली का एक परिवार अचानक विपत्ति में फँस गया। घर में काम करने वाले कुछ दुष्ट लोगों ने लूट के इरादे से उस परिवार के पिता और इकलौते पुत्र की हत्या कर दी। धन लूटकर वे भाग गए। पति-पत्नी जब घर लौटे तो उनके जीवन का आधार ही छिन चुका था।
पति इस शोक को सहन न कर पाया और मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गया। वह बार-बार आत्महत्या करने की बात करता। जीवन उसे निरर्थक प्रतीत होने लगा।
उसका साडू भाई, जो स्वयं एक अच्छे साधक थे और श्री देवदास पहाड़ी बाबा के अनन्य भक्त थे, उसे समझाने लगे –
“संत भगवान से भी बड़े होते हैं। उनके चरणों में श्रद्धा रखने से ही कल्याण होगा। आओ, हम बाबा की शरण में चलते हैं।”
काफी समझाने के बाद वह दुखी व्यक्ति वृंदावन, खाकचौक बाबा के पास पहुँचा।
बाबा से मिलते ही उसने अपना दुख सुनाया। बाबा का स्वभाव कड़क था। उन्होंने डाँटकर कहा –
“क्यों आया यहाँ? मरना ही है तो सीधा जाकर मर जा। आत्महत्या करने से क्या लाभ? यहाँ आ गया है तो जप कर, राम-राम कर।”
दुखी व्यक्ति रोते हुए बोला – “बाबा! हम संतान के शोक से जर्जर हो गए हैं। अब किसी उपाय से संतान नहीं हो सकती। मेरी पत्नी का गर्भाशय निकाल दिया गया है, डॉक्टरों ने स्पष्ट कह दिया है कि अब संतान की कोई संभावना नहीं।”
बाबा ने कड़क स्वर में उत्तर दिया –
“क्या डॉक्टर भगवान से बड़े हैं? हमने कह दिया कि संतान होगी, तो होगी। रामजी देंगे तो कौन रोक सकता है?”
साडू भाई ने इशारा किया कि अब और बहस न करो। बाबा की वाणी ही सिद्ध है।
और देखिए बाबा की कृपा – एक वर्ष के भीतर उस घर कन्या का जन्म हुआ। डॉक्टर स्तब्ध रह गए। वे सोच भी नहीं पाए कि जिसका गर्भाशय ही निकाल दिया गया हो, वहाँ संतान कैसे जन्म ले सकती है! उन्होंने भी स्वीकार किया कि यह किसी अलौकिक शक्ति का कार्य है।
उसके बाद वह दंपत्ति हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर आश्रम पहुँचकर सेवा करने लगे।
एक बार उनकी छोटी कन्या बाबा के पास आई और बोली –
“बाबा, मुझे एक भैया चाहिए।”
बाबा ने हँसते हुए पूछा – “किसने सिखाकर भेजा?”
कन्या बोली – “मेरी माँ ने।”
बाबा ने उसकी माँ को बुलाया और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। और अगले वर्ष सचमुच उस परिवार में पुत्र का जन्म हुआ।
इस प्रसंग से स्पष्ट है कि बाबा की वाणी केवल शब्द नहीं, बल्कि सिद्ध वाणी थी।
दूसरा प्रसंग : असाध्य रोग से मुक्ति
ग्वालियर के एक डॉक्टर दंपत्ति बाबा के भक्त थे। दोनों कृषि विभाग में नौकरी करते थे, परंतु जब भी कार्तिक पूर्णिमा का उत्सव आता, वे वृंदावन खाकचौक पहुँचकर सेवा करते। साधारण सेवा – झाड़ू लगाना, बर्तन धोना, शौचालय साफ करना – सब वे बड़े आनंद और विनम्रता से करते।
एक बार बाबा अपनी जमात के साथ ग्वालियर उनके घर पधारे। उस समय डॉक्टर साहब की पत्नी बहुत बीमार थीं। उनकी दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी थीं। वे अत्यंत कमजोर होकर बिस्तर पर पड़ी थीं।
उन्होंने बाबा को प्रणाम किया और रोते हुए कहा –
“बाबा, इस बार मैं कार्तिक पूर्णिमा के उत्सव में आकर सेवा नहीं कर पाऊँगी। यह सोचकर दुखी हूँ कि गुरुस्थान की सेवा छूट जाएगी।”
बाबा ने इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की। केवल इतना कहा –
“चिंता मत करो। समय से पहुँच जाना। तुम्हारे बिना सेवा कौन करेगा? झाड़ू-बर्तन कौन करेगा? तुम ज़रूर आओगी।”
इतना कहकर वे चले गए।
कार्तिक पूर्णिमा का अवसर आया। सब लोग आश्चर्यचकित रह गए जब वह दंपत्ति उत्सव में पहुँचे और पहले की तरह सेवा में जुट गए।
बाबा ने मुस्कराकर पूछा –
“अब कैसी हैं तुम्हारी किडनियाँ?”
भक्तिन की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली –
“बाबा, कुछ दिन पहले आप मेरे स्वप्न में आए। आपने मुझे उठाकर बिठाया और मेरी कमर पर दो लात मारी। अगले दिन मेरी कमजोरी चली गई। जब जाँच कराई तो डॉक्टरों ने कहा – अब आप बिल्कुल स्वस्थ हैं, आपको कोई रोग नहीं है। डॉक्टर भी आश्चर्यचकित रह गए कि रातों-रात किडनी की बीमारी कैसे समाप्त हो गई।”
यह सुनकर भक्तों के हृदय आनंद और श्रद्धा से भर गए।
बाबा की वाणी और शिक्षा
इन दोनों प्रसंगों से यह स्पष्ट होता है कि श्री देवदास पहाड़ी बाबा केवल साधारण साधु नहीं थे।
उनकी वाणी कठोर अवश्य थी, परंतु उसमें सत्य और कृपा दोनों छिपे रहते।
उनका विश्वास अटूट था कि संत और भगवान की शक्ति से असंभव भी संभव हो सकता है।
उन्होंने यह शिक्षा दी कि आत्महत्या या निराशा कभी समाधान नहीं है। सच्चा समाधान केवल भगवान का स्मरण और संतों की शरण है।
सेवा का महत्व उनके जीवन का आधार था। जो भक्त तन-मन से सेवा करता था, बाबा की कृपा उस पर स्वतः बरसती थी।
निष्कर्ष
श्री देवदास पहाड़ी बाबा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब संसार के सारे उपाय निष्फल हो जाते हैं, तब संत कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। संतानहीन दंपत्ति को संतान, असाध्य रोगी को स्वास्थ्य और निराश मनुष्य को जीवन का उद्देश्य देने वाले बाबा वास्तव में सिद्ध महापुरुष थे।
उनकी वाणी हमें यह संदेश देती है –
“कभी निराश मत हो। रामनाम जपते रहो, संतों की सेवा करते रहो, कृपा अवश्य मिलेगी।”
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