श्री भक्तमाल – ३०: श्री चंद्रशेखर दास जी | Shri Bhaktmal Ji – 30

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जब श्रीजी स्वयं आईं, भक्त की मर्यादा और प्रभु की कृपा


गोविंद कुंड की पावन भूमि के पास, श्री चंद्रशेखर दास बाबाजी प्रतिदिन प्रातः काल स्नान करके, आन्यौर गाँव के निकट एक विशेष स्थान पर बैठकर साढ़े तीन लाख हरिनाम संकीर्तन का नियम पूरा करते थे। उनका जीवन सादगी, सेवा और भगवन्नाम में पूर्णतः समर्पित था।

एक दिन, भजन करते हुए उनकी कौपीन (लंगोट) अत्यंत जर्जर होकर फट गई, इतनी कि वह उपयोग करने योग्य नहीं रह गई थी। एक वैष्णव संत के लिए मर्यादा का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है, और नग्न अवस्था में घूमना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने प्रतिदिन की तरह पास के घरों से थोड़ी सी भिक्षा माँगी, लेकिन उनका नियम था कि वे आवश्यकता से अधिक कुछ भी नहीं माँगेंगे। उस दिन कौपीन न होने के कारण, वे भिक्षा मांगने भी नहीं जा पाए।

अपने नियम और मर्यादा को बनाए रखने के लिए, वे पास की एक गुफा में जाकर भजन करने बैठ गए। उन्होंने सोचा कि जब तक कोई समाधान नहीं निकलता, वे यहीं रहकर हरिनाम जपते रहेंगे। इस प्रकार, गुफा के एकांत में भजन करते-करते दो दिन बीत गए। उन्होंने उस दौरान कुछ भी ग्रहण नहीं किया था।

तीसरे दिन, एक छोटी सी बालिका वहाँ आई। वह पास ही में भजन कर रहे एक अन्य संत की कुटिया पर गई और उनसे कहा, “महाराज, यहाँ पास की गुफा में एक गौड़ीय वैष्णव महात्मा भजन कर रहे हैं। उनकी कौपीन फट गई है, इसलिए वे गुफा के भीतर ही बैठे हैं। वे दो दिनों से भूखे हैं। मैं उनके लिए कुछ प्रसाद और एक नई कौपीन लेकर आई हूँ। मैं उनके भजन में विघ्न नहीं डालना चाहती, कृपया आप यह वस्तुएँ उन तक पहुँचा दें।”

वह संत, जो स्वयं सिद्ध थे, बालिका की बात सुनकर गुफा के भीतर गए। उन्होंने श्री चंद्रशेखर दास बाबाजी से कहा, “बाबा! आपने दो दिनों से कुछ भी ग्रहण नहीं किया है। आपके लिए प्रसाद और एक नई कौपीन आई है।”

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श्री चंद्रशेखर दास बाबाजी यह सुनकर अत्यंत विस्मित हुए। उन्होंने पूछा, “आपको कैसे पता चला कि मैं दो दिनों से भूखा हूँ और इस गुफा के भीतर हूँ? मैंने तो किसी से कुछ कहा भी नहीं था, और न ही मेरी कौपीन फटने की बात किसी को बताई थी।”

वे संत बोले, “एक छोटी सी बालिका आई थी, वही मुझे यह सब देकर गयी है और कहने को कह गयी है।” यह कहकर वे संत चले गए।

बाबा श्री चंद्रशेखर दास जी को यह समझते देर नहीं लगी कि यह स्वयं श्रीजी (श्री राधाजी) की कृपा है, जो उनके भक्त की मर्यादा और आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए स्वयं पधारे थीं। यह सोचकर कि मेरे कारण श्रीजी को कष्ट हुआ, उन्हें अपना प्रसाद लाना पड़ा, वे करुण भाव से रोने लगे।

उसी क्षण, वहाँ स्वयं श्रीजी प्रकट हो गईं। उन्होंने बाबा के आँसू पोंछते हुए कहा, “मेरे शरणागत भक्तों की चिंता मुझे सदैव रहती है। तुम इसे स्वीकार करो।” श्रीजी ने उन्हें वह कौपीन और प्रसाद प्रदान किया।

इसके पश्चात्, श्रीजी ने बाबा को वृंदावन में जाकर भजन करने की आज्ञा दी। यह घटना दर्शाती है कि प्रभु अपने भक्तों की मर्यादा और उनकी आवश्यकता का कितना ध्यान रखते हैं, और उनकी कृपा असीम है।

 


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