श्री भक्तमाल ४१ : एक नामनिष्ठ आदिवासी भक्त | Shri Bhaktmal Ji – 41

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एक नामनिष्ठ आदिवासी भक्त की अविचल निष्ठा

यह एक सत्य कथा है, जैसा कि स्वयं अवध के सिद्ध संत श्री पंचारसाचार्य जी महाराज के शिष्य श्री रविशंकर शुक्ल (श्री रामदास जी) ने सुनाई थी। यह कहानी बताती है कि कैसे भगवान के नाम में कितनी अद्भुत शक्ति होती है और कैसे एक साधारण व्यक्ति की सच्ची श्रद्धा उसे मोक्ष तक पहुँचा सकती है।

 एक साधारण किसान

बाबा श्री रामदास जी का शाहनगर के पास कचोरी गाँव में एक छोटा सा खेत था, जहाँ एक आदिवासी व्यक्ति खेती का काम करता था। हर दिन, महाराज जी अपने मजदूरों के लिए दोपहर का भोजन लेकर जाते थे। एक दोपहर जब वे खेत पर पहुँचे, तो देखा कि वह आदिवासी पास के तालाब में मछलियाँ पकड़ रहा था। महाराज जी ने कुछ कहा नहीं, बस इतना ही कहा, “कल से काम पर मत आना, मैं तुम्हें कहीं और काम दिलवा दूँगा।”

आदिवासी ने दुखी होकर पूछा, “महाराज! मुझसे क्या गलती हो गई?” महाराज बोले, “मैं तुम्हारे लिए सात्विक भोजन लाता हूँ, और तुम जीव हिंसा करते हो। मैं ऐसे पापी को अपने यहाँ काम पर नहीं रख सकता।”

यह सुनकर वह बहुत शर्मिंदा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, “महाराज! मैं सच कहता हूँ, अब कभी किसी जीव को नहीं मारूँगा। मुझे यहीं काम पर रहने दीजिए।” उसकी ईमानदारी देखकर महाराज जी मान गए।

मोक्ष का मार्ग

अपने पापों के बोझ से दुखी होकर, उस आदिवासी ने महाराज से मुक्ति का मार्ग पूछा। “मेरे मन में बहुत दुख है कि मैंने इतने पाप किए हैं,” उसने कहा। “कृपा करके मुझे इन पापों से मुक्त होने का कोई उपाय बताएँ।”

महाराज जी मुस्कुराए और उसे एक सरल, पर बहुत ही गहरा मंत्र दिया: “बस ‘सीताराम सीताराम’ जपा करो।” उन्होंने उसे भगवान के नाम की महिमा और उसके प्रभाव की कहानियाँ सुनाईं। वह व्यक्ति स्वभाव से बहुत ही सीधा और भोला था, उसने पूरी श्रद्धा से गुरु की बात मान ली और ‘सीताराम’ नाम को कभी न छोड़ने का संकल्प लिया।

धीरे-धीरे, उसका मुँह हर समय हिलता रहता। नाम जप उसके लिए एक निरंतर प्रवाह बन गया, यहाँ तक कि नींद में भी उसका जप चलता रहता था। उसके पास कोई माला नहीं थी, इसलिए वह महाराज जी को देखकर अपनी उँगलियाँ हिलाता रहता था।

 आस्था की अग्निपरीक्षा

कुछ समय बाद, उसे एक स्वप्न आया। एक संत ने उससे कहा, “सीताराम का जाप छोड़ दो, नहीं तो तुम्हें बहुत कष्ट होगा।” घबराकर वह महाराज जी के पास गया और सारी बात बताई। महाराज जी ने कहा, “अगर तुम कष्ट नहीं सह सकते तो नाम छोड़ दो।”

उसने तुरंत जवाब दिया, “मैं ‘सीताराम’ का जाप नहीं छोड़ सकता। अगर मैंने छोड़ दिया तो मैं मर जाऊँगा।” उसकी अविचल निष्ठा देखकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और बोले, “नाम को मजबूती से पकड़े रहो।”

अगले ही दिन से उसके पैरों में भयंकर जलन होने लगी। यह जलन इतनी थी कि अगर वह अपने पैर पानी में डालता, तो पानी भी गरम हो जाता। कुछ ही दिनों में उसके पैरों के तलवों की चमड़ी निकल गई। यह उसके जन्मों-जन्मों का प्रारब्ध था, जो ‘सीताराम’ नाम ने जला दिया था। उसी रात उसे फिर से वही संत स्वप्न में दिखे, जिन्होंने कहा, “तुम्हारे जन्मों-जन्मों का प्रारब्ध इस ‘सीताराम’ नाम ने निकाल दिया। अब भगवान का प्रसाद पाओ।” और उन्होंने उसे एक लड्डू दिया। सुबह उठने पर, वह लड्डू सचमुच उसके हाथ में था।

अंतिम यात्रा

जैसे ही उसने वह दिव्य प्रसाद खाया, उसका मन संसार से पूरी तरह हट गया। उसे घर-परिवार के कामों में कोई रुचि नहीं रही। वह बस एक जगह बैठकर घंटों नाम जप करता रहता था। एक दिन, वह एक पेड़ के नीचे जप करते हुए ही अपने शरीर को छोड़ गया।

आसपास के लोग इकट्ठा हुए और देखा कि उसकी उँगली अभी भी हिल रही थी। उन्होंने सोचा कि जब उँगली हिलना बंद हो जाएगी, तब वे उसका अंतिम संस्कार करेंगे।

उधर, उसकी आत्मा यमलोक में पहुँची। वहाँ भी उसका नाम जप चल रहा था। यमराज दिव्य सिंहासन पर बैठे थे। उन्होंने यमदूतों से कहा, “तुम किसी और को ले आए हो। इसकी मृत्यु तो अमुक तिथि को होनी है। यह तो भगवान के साकेत लोक जाएगा, यहाँ नहीं आएगा। इसे वापस छोड़कर आओ।”

उस व्यक्ति ने पूछा, “यह कौन-सी जगह है?” यमदूतों ने बताया कि यह यमलोक है, जहाँ कर्मों का हिसाब होता है और पापियों को नरक में यातनाएँ दी जाती हैं। उसने यमराज से एक और प्रार्थना की, “मुझे एक बार नरक के दर्शन करने हैं।” यमराज ने कहा, “भगवान के नाम का जाप करने वाले को नरक नहीं दिखाया जा सकता, लेकिन तुम भगवान के भक्त हो इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा।” उसे नरक के दृश्य दिखाकर वापस भेज दिया गया।

वह जीवित होकर बैठा और महाराज जी को सारी बातें बताईं। उसने कहा, “नरक की यातनाएँ इतनी भयानक हैं कि मैं काँप गया।” उसने यमराज से सुनी हुई अपनी मृत्यु की तिथि भी बताई। ठीक उसी तिथि पर उसने अपना शरीर त्याग दिया और भगवान के परम धाम को चला गया।


यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान का नाम जपने से किस तरह हमारे सारे पाप धुल जाते हैं और कैसे एक साधारण व्यक्ति भी अपनी सच्ची श्रद्धा से मोक्ष पा सकता है।