श्री भक्तमाल १३ – श्री विट्ठालेशसुत जी | Shri Bhaktmal Katha Part 13 | Shri Vitthaleshsut Ji

Shri Bhaktmal Katha Shri Vitthaleshsut Ji
Shri Bhaktmal Katha Shri Vitthaleshsut Ji

श्री भक्तमाल १३ – श्री विट्ठालेशसुत जी

श्री भक्तमाल श्री विट्ठालेशसुत जी

गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के सात पुत्रों को सर्वभूत सुहृद साक्षात श्री गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण जानकर उनका ध्यान करना चाहिए । उनके नाम है –

१. श्री गिरिधर जी, जो बड़े रसिक एवं अत्यंत सुंदर शील स्वभाव वाले थे । 

२. श्री गोविन्दजी का स्वभाव भी वैसा ही था। 

३. श्री बालकृष्णजी महायशस्वी हुए । 

४. श्री गोकुलदास जी बडे धीर महापुरुष हुए । 

५. श्री रघुनाथ जी महाराज ।  

६. श्री यदुनाथ जी महाराज अपने समगुणों से भजने योग्य हुए । 

७. श्री घनश्याम जी सदा-सर्वदा प्रभुप्रेम मे पगे रहते थे, बड़े अनुरागी थे, हृदय मे हमेशा प्रभुक्री स्मृति सँजोये रहते थे । 

इनका भजन करना चाहिए ये सातों प्रत्यक्ष भगवादविभूति थे, भगवद्भजन मे परम प्रवीण एवं समर्थ थे तथा श्री कृष्ण की ही भाँति ये भी संसार का उद्धार करनेवाले थे । भक्तमाल में श्री नाभादास जी स्पष्ट कहते है कि इन सातों महापुरुषों का यशोगान करना चाहिय, नित्य स्मरण करना चाहिए । 

Shri Bhaktmal Katha Shri Vitthaleshsut Ji

गुसाई श्री विट्ठलनाथ जी का श्री ठाकुर जी के प्रति वही भाव था, जो नन्दरायजी और यशोदारानी का बालकृष्ण के प्रति था । श्री ठाकुर जी ने भी इनके वात्सल्यभाव को स्वीकार किया था और उनके साथ छोटे बालक-जैसी ही लीला किया करते थे । वे कभी दूध पीने मे आना कानी करते, कभी सोने मे तो कभी बन्दर से डरकर उनकी की गोद मे छिप जाते । श्री गुसाँई जी उनकी इस लीला से आनन्दविभोर हो जाया करते थे । उनके वात्सल्य भावपर रीझकर एकबार श्री ठाकुर जी प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा । तब आपने यह वर माँगा कि आपने द्वापर मे श्री नन्दराय जी को जैसी बाललीला का सुख दिया एवं उनका आपमे जैसा वात्सल्य-स्नेह था, वैसा ही सुख एवं वैसा ही स्नेह आप कृपा करके हमको भी प्रदान करें।

तब श्री ठाकुर जी ने कहा-पिता के रूप मे तो मुझे आप पितृसुख दे देंगे, पर बिना माता के मेरी बाललीला का पूर्ण विकास कैसे होगा ? अत: पहले आप मेरे रिक्त मातृपद की पूर्ति करें, फिर आपको परम प्रभावशाली सात पुत्रों की प्राप्ति होगी । उन सभी पुत्रों मे पाँच-पाँच वर्षतक मेरा आवेश रहेगा । इस प्रकार आपको दीर्घकाल तक मेरा वात्सल्य सुख प्राप्त होता रहेगा । कालान्तर मे प्रभुकृपा से आपको सात पुत्रों की प्राप्ति हुई और आप दीर्घकाल तक ठाकुर जी की बाल लीलाओं का सुख लेते रहे । आपने अपने सातों पुत्रों के लिये सात गद्दीयों की स्थापना की, जिससे वैष्णव धर्म और भगवद्भभक्ति का खूब प्रचार-प्रसार हुआ । लीला संवरणकाल मे आपने अपने सभी पुत्रों को श्री ठाकुर जी का एक-एक सेवा -विग्रह प्रदान किया था, जिनकी आज भी परम्परागत रूप से सेवा – पूजा हो रही है ।

Shri Bhaktmal Katha Shri Vitthaleshsut Ji


Click here to download : Bhaktmal
Read More :

Narayanpedia पर आपको  सभी  देवी  देवताओ  की  नए  पुराने प्रसिद्ध  भजन और  कथाओं  के  Lyrics  मिलेंगे narayanpedia.com पर आप अपनी भाषा  में  Lyrics  पढ़  सकते  हो।