भगवान के नाम का प्रभाव: जब धाम स्वयं साधक के पास प्रकट हुआ
यह कथा इस परम सत्य का प्रमाण है कि भगवान के नाम में इतनी शक्ति है कि वह स्वयं भगवान और उनके धाम को साधक के पास प्रकट कर देता है। नाम, नामी (भगवान) और धाम में कोई अंतर नहीं होता।
राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र के पास एक गाँव में गोपाली बाई नाम की एक भक्त निवास करती थीं। उनका हृदय वृंदावन धाम के लिए प्रेम और ब्रजरज के लिए असीम श्रद्धा से भरा हुआ था। वे वर्ष में दो बार अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए वृंदावन जाती थीं और वहाँ के संतों की सेवा में भंडारा भी करती थीं।
गोपाली बाई अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। अनेक प्रयासों के बाद भी उनका विवाह नहीं हुआ। समय के साथ उनके माता-पिता वृद्ध और बीमार रहने लगे, जिसके कारण वे उनकी सेवा में इतनी लीन हो गईं कि वृंदावन जा ही नहीं पाती थीं। उनका मन व्याकुल हो उठता, परंतु कर्तव्य-परायणता ने उन्हें कभी घर छोड़ने की अनुमति नहीं दी।
एक दिन, उनके गुरुदेव उनके घर पधारे। गोपाली बाई ने अपनी व्यथा उन्हें सुनाई। गुरुदेव ने उनकी निष्ठा देखकर कहा, “पुत्री, तुम वृंदावन जाने की जिद छोड़ दो। श्री राधारानी ने तुम्हें जिस अवस्था में रखा है, उसे स्वीकार कर उसी में सुख मानकर भजन करो। अपने माता-पिता को छोड़कर जाना उचित नहीं है।” गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य कर, उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा को ही अपनी साधना बना लिया और अपने मुख से सदा इस नाम का कीर्तन करती रहती थीं:
“राधावल्लभ श्री हरिवंश, श्री वृंदावन श्री वनचंद्र”
कुछ वर्षों बाद उनके माता-पिता का देहावसान हो गया। अब गोपाली बाई ने सोचा कि वे वृंदावन जाएँगी, परंतु अब उनका स्वयं का शरीर भी कमजोर हो चुका था। गाँव के लोग कभी-कभी उन्हें भोजन दे जाते, और वे अपना समय नाम-जप में बिताती थीं।
एक दिन, उन्हें अनुभव हुआ कि उनकी मृत्यु निकट है। उनका मन अत्यधिक व्याकुल हो उठा। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे और वे रुदन करते हुए तीव्र गति से पुकारने लगीं, “अब कैसे ब्रजरज पाऊँ? अब कैसे धाम का दर्शन पाऊँ?” उनका पूरा हृदय इस नाम से भर गया था:
“राधावल्लभ श्री हरिवंश, श्री वृंदावन श्री वनचंद्र”
उसी समय, एक अद्भुत चमत्कार हुआ। उन्होंने देखा कि उनकी चारपाई के बगल में यमुना जी प्रकट हो गई हैं। सामने दिव्य श्री गिरिराज जी के दर्शन हो रहे हैं। वह अनुभव कर रही थीं कि उनकी चारपाई साक्षात यमुना जी के किनारे रखी है। यमुना का जल अत्यंत स्वच्छ और दिव्य नील वर्ण का था, और उसके भीतर अलौकिक स्वर्ण कांति के मत्स्य (मछलियाँ) और कछुए दिखाई दे रहे थे। गिरिराज जी स्वर्ण के समान तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे।
कुछ ही देर में गौओं के गले की घंटियों की मधुर ध्वनि सुनाई दी। उन्होंने देखा कि साक्षात भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी हजारों सुंदर गायों के साथ वहाँ आ रहे हैं। गौ माताओं के चलने से जो ब्रजरज उड़ रही थी, वह उनके शरीर का स्पर्श करने लगी। भगवान की गौ-चारण लीला को देखते-देखते, उन्होंने अपने ही बिस्तर पर, दिव्य वृंदावन धाम के मध्य में अपने प्राण त्याग दिए।
आज के समय में कई युवक-युवतियाँ माता-पिता को छोड़कर वृंदावन वास करना चाहते हैं। कई लोग अपने माता-पिता की सेवा छोड़कर तीर्थों में निवास करने की जिद पकड़े हुए हैं। इस प्रसंग से उन्हें यह गहरी शिक्षा मिलती है।
श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि जो लोग अपने माता-पिता की सेवा नहीं करते और उनका पोषण नहीं करते, वे कितने भी धार्मिक कर्म कर लें, पर नरक को अवश्य जाते हैं। वहाँ उन्हें भूखा रखा जाता है, और जब वे भूख से व्याकुल होकर चिल्लाते हैं, तो यमदूत उनके अपने ही शरीर का मांस नोचकर उन्हें खिलाते हैं।
भगवान की कृपा से जिन्हें ब्रजवास मिला है, वे तो धन्य हैं ही, परंतु जिन्हें अभी यह सौभाग्य नहीं मिला है, उन्हें यह समझना चाहिए कि भगवान ने उन्हें जहाँ रखा है, वहीं रहकर निष्ठा से नाम-जप करना चाहिए। क्योंकि नाम, भगवान और धाम में कोई अंतर नहीं है। नाम में इतनी शक्ति है कि वह स्वयं ही साधक के पास धाम को प्रकट कर सकता है।

- श्री चैतन्य महाप्रभु को वृंदावन का प्रचंड विरह होता था, परंतु अपनी माता के लिए वे जगन्नाथ पुरी में ही रहे और वहीं से वृंदावन की अनुभूति करते रहे।
- मीरा बाई ने भी नाम के प्रभाव से वृंदावन को अपने ही निवास स्थान मेड़ता क्षेत्र में प्रकट कर लिया। उनके लिए ब्रज की लता-पत्ता, गोवर्धन, और सभी कुंड मेड़ता में ही प्रकट हो गए थे।
- श्री राधाबाबा और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी गोरखपुर में रहकर भी धाम का नित्य अनुभव करते थे।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति किसी स्थान की मोहताज नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और नाम-जप की निष्ठा पर निर्भर करती है।
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