।। लावण्य छंद रंगत लंगढी शेर ओछी ।।
गांव सालासर में विराजे धौरे पर हनुमानजी।
बाई कान्ही के भाई मोहनदास के हित आनजी।।
आते हजारों ग्राम के नर नार भक्ती ठानजी।
कारज सकल का सिद्ध करते वास अपना जानजी।।
बाई कान्ही की पूजन धार,
हुआ जिनका परिवार अपारजी।
लख के गोहन संसार असार,
ज्योत में मिले समाधि धारजी।।
नहीं आवें छायां म्हारी,
करूं संकट में सहाय थारी।
ग्रहस्थ होय पुजो,
यह वर दिन्हा पवन कुमार जी ।।
1.

कर मरजी सालासर उपर,
धोरे पर बिराजे हनुमान।
निज भक्त जान के विप्र मोहन की,
भक्ति लखि उर म्यान।।
बीकानेर राज्य अन्र्तगत, शुभ सालासर नामक ग्राम।
जहाँ बाला जी बिराजे, सुंदर मन हरणां है धाम ।।
मोहन भक्त रहत भक्ति में, हो विरक्त अंजनी सुत नाम।
धरयो ध्यान वो टरयो दुख, सरयो सकल उनको मन काम।।
।। दोहा ।।
दधीच द्विज सुंटवाल,
2.

सालासर में थे सुखराम जी।
पाटोद्या लछिरामजी की लड़की,
थी कानि नाम जी।।
षट् पुत्र पुत्री सातवी,
जन्मी रूल्याणी ग्राम जी।
छोटा ही छोटा पुत्र मोहनदास
था गुणधाम जी ।।111
।। रंगत ओछी ।।
सुखराम जी से कानि, उदयराम सुत जाया।
भये वर्ष पाँच सुखराम जी स्वर्ग सिधाया।।
लछिरामजी के सुत, षट् रूल्याणी से आया।
निज भगिनि को आतुर देख यूँ वचन सुनाया।।
छोटा ही छोटा मोहन बोला, सुणो भाई।
ये दुखड़े का दिन कैसे काटसी बाई ।।
3.

एक रहो पास अपने में से चित चाई। उदय भी होय हुंसियार देर नहीं काई ।।
।। दोहा ।।
सुन भाय्यां उत्तर वियो म्हांक टाबरी साथ जी। रहयां सरे नहीं एक पल तुम सुनो हमारे भ्रातजी ।।
।। मिलाप ।।
दुख मेटन भगिनिका मोहन, सालासर में रहे सुजान। निज भक्त जान के विप्र मोहन की भक्ति लखि उरम्यान ।। टेर।।
वर्ष रहे दो चार पास भगिनि के दुख दिन कटा विया।
भानेज उवय का ब्याह भी,
4.

अच्छी तरह से करा दिया।।
सम्बूत अठारह सौ ग्यारह में खेती को धंधो धार लिया।
हलबावे भानजो गंडासी आप हाथ ले सूड किया।। ।। शेर ।।
उस वक्त आय मोहन से कही महावीर स्वामी आपजी। गंडासी खोश बगाय दी, मत कर रे पापी पाप जी ।।
रैन दिन हरि को भजो, और जपो अजपा जाप जी। कर माफ औगुण गौण हरे त्रय ताप तन कर साफ जी
5.

।। रंगत ओछी ।।
मांमें को फिकर में देख भाणजा बोले। नहीं शरदा है तो मामां तू घड़ी दोय सोले ।।
कहें मामां सुन भाणेज जीव मेरा डोले। कोई देव भयो मेरे गैल, देह झक झोले ।।
घर सांझ पड़ी मामो भाणजो आया। माता के साथ उदयरामजी बात बतलाया।।
माँ मामां के भरोसे धान खेत का खाया। नहीं करे काम मांगे को कोई बहकाया।।
।। दोहा ।।
माता कहे बेटा सुणो, मांमो हुयो मोटयार जी । व्याह सगाई जल्दी इनका है करना में सार जी
6

धातु ।। मिलाप ।।
करी सगाई गहनों धडायो बेच बेच के सूंगो धान। निज भक्त जान के विप्र मोहन की भक्ति लखि उन म्यान।।
गहणों घालन नाई गयो, जद मोहन कह मतकर बेगार।
बा छोरी तो मर गई, निकमो आसी नाई जार।। वहां जा नाई देख हकीकत, सभी कही या पाछो आय। सांची बरती वार्ता, गोहनदास जी कही विचार ।। फ.न.2।। ॥ दोहा ॥

एक दिन कानी, उदय मोहन,
यह भोजन कर रह्या।
साधु का धर के भेष, आ हनुमान हाका कर गया।।
आया जी म्हे आया जी म्हे,
दो चार बेरी यूँ कहा।
मोहन कहे तू घाल आटो, बाई कानी कर दया।।
।। रंगत ओछी ।।
वा लाई आटो साधु द्वार नहीं पाया।
दो मास दे आड़ा, फेरूं वचन सुनाया।।
तूं कहता सो हनुमान साध फिर आया। सुन बचन लार, न मोहन फिर उनको धाया।।
आगे आतां महाराज बहुत धमकाया।
8

मोहन ना छोडी गैल गैल हो धाया।।
ले सोटा हाथ में बजरंग बली डराया। चरणों में पड़ा द्विज काठा पकड़ा पाया।।
।। दोहा ।।
मत आ म्हार गेल मोहन, मैं समझानूँ तोयजी।
मांगे सो बरदान देऊं तुझ पे परसन होयजी।।
।। दोहा ।।
बोले विप्र दोऊं कर जोड़े, पीछे चलो हनुमान मकान।
निज भक्त जान के विप्र मोहन की भक्ति लखि उर म्यान।।
यूं बोले हनुमान साध तोये इतना करना होय गो।
9.

खीर खांड का भोजन खाकर, सेज अछूति सोयेंगे।।
मोहनदास मंजूर किया जद यहा प्रकट हम होवेंगे।
वरदान दिया यह,
भजन करने से पाप सब खोर्वेगे।।
।। शेर ।।
वो भजन करता ज्ञान देता, विप्र जो-जो ज्ञान को।
वो बण्यो पुस्तक एक मोहनदास बाणि नाम को।।
वा में है भक्ति प्रीति रिति ध्यान श्री हनुमान को।
जो पाठ करसी, काज सरसी, सर्व उस गुणवान को।।
।। रंगत ओछी ।।
है एक दिवस का जीक फौज चढ़ आई।
10.

सालम सिंह ठाकुर की अकल चकराई।।
जद मोहनदास सारा से बात बताई।
बजरंग कहे होसी फतेह डरो मत भाई ।।
एक तीर छोड़ कर लीली झंडी उड़ा दे।
सब ग्राम का फंदा ठाकुर जल्द छुड़ा दे।।
इस फौज को पाछी यहाँ से तुरंत भगा दे।
दुश्मन को पड़ा पैरों में हाथ जुड़ा दे।।
।। दोहा ।।
परचा मोहनदास ठाकर देख अपार।
बालाजी स्थापन्न की लीन्हीं सलाह विचार ।।
।। मिलाप ।।
जद आशोटे हलके ओटे, श्रावण में प्रगटे हनुमान। निज भक्त जान के विप्र
11.

[6:35 AM, 10/3/2024] Sir Xyz: मोहन की भक्ति लखि उर म्यान।।
मूर्ति देख खुशी भये ठाकुर निज महलां मे धरी मंगाय।
सूते ठाकुर के स्वप्न में आ कही मोही सालासर तुरंत पुगाय ।।
सालासर मन मान्यो ग्राम,
जहां लेजा देना पधराय।
सम्बत् अठारह सौ पन्द्रह में, लीन्हों यह मन्दिर चिणवाय ।।
।। शेर ।।
राम लक्ष्मण संग ले, आयी जो सीता मात जी।
श्री कृष्ण आये विप्र को, लेने ले राधे साथ जी।। मोहन समाधि ली जहां हद बांध दी रघुनाथजी।
इस जगह थाने कर्ने,
12.

ज्यो त्यो न कलयुग आत जी।। ।। रंगत ओछी ।।
यह वचन देय श्रीपति दोउ साथ सिधाया। उस दिन से प्रति दिन बजरंग बली पूजाया।।
दे देकर पर्चा लोग कई बुलवाया।
कई महल तिबारा मंदिर कुंड चिणाया जो नर हित से श्री बजरंग को ध्यावे। उनकी तो कामना सब पूर्ण हो जावे।। कई आवे यात्री, छप्पन भोग लगावे। कई छत्र टोकणां रूपया रोक चढ़ावे ।।
।। दोहा ।।
बांधे बन्ध्यां जो जाल के जो नारी नरेलजी। नौवें महीने पुत्र खिलावे, करे फलंति बेला ।।
13.

।। छंद ।।
जो नर ध्यावे हनुमान को वो नर
खुशी रहे जग मांहि।
निज भक्त जान के ।। टेर ।।
रत्न जड़ित बंगले में बजरंग बिराजे शोभा भारी।
हित चित मनसे विधि से पूजन रचे पुजारी ।।
बालभोग धर करे आरती, राजभोग को त्यारी जी। चढे चूरमा, खीर, सीरा, पूरी और त्यारी जी।।
।। शेर ।।
ज्योत जगती है अटल दिन रैन धृत और तेल की। हौद, कुवां चूंतरा, भंडार शोभा महल की।।
14.

आवैं हजारों जातरी,
क्या बहार है इस शहर की।
हर मास में मेला भरे, चिटकियाँ बटे नारेल की।।
।। रंगत ओछी ।।
गुरू रामनारायण रामचंद्र दोनूं भ्राता ।
जिनके घर विद्या पठन हमेशा जाता जिनका मे उठ
प्रभात, विमल यश गाता।।
गये स्वंग गुरू को सुखसे रखे विधाता ।।
निज गुरू की सिख दो अक्षर पढ़ि लेता।
उन गुरू की जन्म भर, करे शिष्या नित सेवा ।। के पावे ज्ञान सम्मान, और नित मेवा। नुगरा दुःख भोगे,
15.

काढ़ गुरू से केवा ।।
।। दोहा ।।
डोडवाणपुर में बसे
गुरू गुरज नंदलालजी।
स्वरूप नारायण ने कथ्या।।
छप्पन में छन्द रसालजी ।।
।। मिलाप ।।
सकल करे सिद्ध काज,
भक्तों को हनुमान देवो वरदान । निज भक्त जान के विप्र मोहन की भक्ति लखि उर मयान ।। ।। इति शुभम् ।।
16.

अद्भुत बंगला
टेर
सालासर में बंकट बाला बणी छटा अति भारी है।
अद्भुत बंगला जीनो के कंचन छत्र हजारी है।। अंजनी कुमार करके विचार जिन आज्ञादिनी है। श्रीराम सालासर में आयके सुन्दरता बनवाली धाम मोहनदासजी पर करी कृपा थे भक्त जानकर राख्यो मान दिया जो दर्शन जिन्हों को मनवांछित दिया बरदान
(शेर)
करजोड़कर मोहन कहें, एक अरज या सुणलिजिये। भगिनी हमारी ताहि सुत को, कर के कर पकड़ लिजिये।।
ग्रहस्थ हो पूजन करें, एक अरज या गुजरात हूं। लियो शरणो चरण करो, नाथ को मैं दास हूं।।
चौपाई
रूद्र वसु शशि सम्बत् जानो, रस मुनि रस शशि साको मानो। श्रावण सुदी नोम्यूं शनिवारा, यहां प्रगटे श्री पवन कुमारा
17.

टेर
महाबीर मेटोगे पीर अब यहां से अरज हमारी है।
अद्भुत बंगला….
11
शशि खोल चन्दन की वायुनन्दन की छवि ऐसी सोहे पुनी सर्वमन मोहे हाथ में गदा गुर्ज बंका सोहे ज्योति अखण्डित अटल विराजे अग्र धूप बाती होवे
बजरंग बली के दर्शन में कलिकल मल सबतन धोवे
शेर
ध्वजा पताका सुब सोहे, तापर जो नेजा फर रहे गर्जे ज्यों नोपत बहोत सुन्दर इन्द्र ज्यों नभ थर रहे झलकी टंकोरा झांझ बाजे, शब्द सुनकर मन हरे शंख और सहतार बाजे, भक्त जन जय जय करे
चौपाई
मन्दिर भवन रच्यो अति भारी, छाजा चित्रक सजे जटारी। सीकर नरपति परचो पायो, देवीसिंह पुनी महल चिणायो
टेर
18.

ओर बहुत सेवक बणबाई ऐसी सुन्दर तिबारी है। अद्भुत बंगला..
11
टेर
माघव उर्ज बडे दो मेला आबे देश के नर नारी। करे चढावो श्री बाला के कंचन छत्र रजत भारी ।। मोदक खीर चुरमा पुआ व्यंजन सुप सरस त्यारी। भोग लगे बजरंग बाला के सुन्दर कनक भरे झारी।।
शेर
घण्टा ज्यों नाद सुहावनी, पुनी वेद ध्यनि द्विज गात है। ताम्बुल काथा और सुपारी, भक्त जन जहां लात है। मन कर्म वाचा शुद्ध कर, नर कामना जो चाहत है। पुरे जो आशा वायु सुत, ऐसा ही समरथ नाथ है।।
चौपाई
पुनम भौम शनिश्चर मेला, आवे जात्री सांझ सबेरा। गजरथ ऊँट अश्व चाडे आवें, श्री बालाजी के दर्शन पावे ।।
टेर
करे रसोई सरस पुजारी ताकि बहुत हुंस्यारी है।
19.

अद्भुत बंगला.
टेर
करो सहाय संकट में प्रभुजी में थार शरण आयो। किया जो दर्शन नाथ तब आनंद उर विच ना मायो।। आल बाल बालक ज्यों वाणि ऐसी ही यो पद गायो। श्री बजरंग बली के आयकर चरणां को शरणो पायो।।
शेर
बसु भान खेता निशपति, यही जो सम्बत जानियो। राम चक्षु अष्टमी, पुनीताहि साको मानियो।। आषाढ़ शुक्ला पुर्णिमां, दधि सुत सवार पिछानियो। रच छन्द खासा सरस या, हनुमान भेंट धराणियो ।।
चौपाई
भेद अगम गन को नहीं जानो, दुग्धा अक्षुर नाहीं पिछानो द्विज मनवा कर कृपा किज्यो, पवन कुमार शुद्धक लिज्यो करो सर्व दुःख नाश दयानिधि आपसे अर्ज हमारी है।
अद्भुत बंगला.
11
।। बोल बजरंग बली की जय ।।
20.

।। लावणी ।।
गांव सालासर के नाथा, भगत की सहाय करो दाता कारज सियाराम का किन्हा, राज पुथ्वी का दे दिन्हा। जगत में ज्योति बड़ी भारी, ध्यान तेरो धरया नर नारी।। अठासो ग्यारोतर प्रगट भयो हनुमान रामा-रामा।।
मोहनदासजी पर कृपा किन्ही बणी धोरे पर धाम जातरी खुब चला आता जी
भगत की सहाय करो…
भगती थारी मोहनदास किन्ही, माया तृष्णा तज दिन्ही। वचन में उनके तुम आया, परचा सांचा दिखलाया।।
धन आव सब देश को बिन्या मगाया माल रामा-रामा
सिरा पुरी और चूरमा जीमे हर का लाल
भेंट ले बजरंग की आता जी
21.

भगत की सहाय करो…
प्रगट भये श्रावण के माही जमी से मुरत निकल आयी। आसोट से चापांवत ल्यायो जी, धोरे पर बुंगलो चिणवायो।।
कान्ही दादी पुजा कर ले बजरंग को नाम रामा-रामा रूल्याणी में जन्म लियो है आय सालासर धाम भगती कर नित दर्शन पाता ।।
भग
भग
भगत की सहाय करो.
रात दिन अखण्ड जोत घारी, नोपत बज रही झिणकारी। कान्ही को वंश बढ्यो भारी, गृहस्थ में पुजा थारी।
मनस्या पूरण आप हो जें कोई देव धोक रामा-रामा छत्रा मोहर चरू टोकणा चढ़े रूपयो रोके, जातरी इच्छा फल पाता
भगत की सहाय करो.
22.

द्रव्य तो भोत चल्यो आव, आपको मन्दिर बणवाय।
भाव से जो काई नर ध्याव, कामना पूरण हो जाव।। निशदिन आब जातरी मेला भरे अपार रामा-रामा पुत्रा देत है बांझ को और मंगल गाव नार, नाम ले बजरंग का आता।।
भगत की सहाय करो.
सिंहासन की शोभा भारी, हो रही पुजन की त्यारी।
गुदड़ी गल बिच म डारी, सामने रख दी कटारी।। राजा देवीसिंह देखकर धरयो चरण म शिश। हाथ जोड़ म करू विनती नेचो बिस्वा विस, महल देवीसिंह चिणवाता।।
भगत की सहाय करो….
हेत से बजरंग न ध्याव, भरमना मन की मिट जाब।
नाम से संकट कट ज्याव, दुःख दारिद्र मिट ज्याब ।।
23.

जो ध्याव हनुमान न दुःख कद न आय रामा-रामा अवधपुरी से आप पधारया सालासर के माय धाम या सुन्दर बणवाता।
भगत की सहाय करो.
समाधि मोहनदास लिन्ही, आप से अरज कर दिन्ही।
धान या अमर हो ज्याव, वंश में छायां नही आव मोहनदासजी की विनती सुण बजरंग दे ध्यान रामा-रामा द्विव “सुखदेव” कहे कर जोड़ चरण कमल में ध्यान जोड़कर श्री कृष्ण गाताजी
भगत की सहाय करो.
।। जय श्री बालाजी ।। ।। जय श्री मोहनदासजी की ।। ।। जय कान्ही दादीजी की ।।
24.


