श्री भक्तमाल ४५ : श्री मंगलाचार्य जी | Shri Bhaktmal Ji – 45

श्री भक्तमाल ४५ : श्री मंगलाचार्य जी | Shri Bhaktmal Ji – 45

श्री भक्तमाल का यह अंश श्री मंगलाचार्य जी के असाधारण पराक्रम, उनके वैराग्य और अयोध्या की रक्षा के लिए उनके अद्भुत बलिदान की गाथा है। यह कहानी हमें दिखाती है कि कैसे एक सच्चे संत की शक्ति न केवल तप और जप में होती है, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए लड़ने में भी होती है।

मंगलाचार्य जी का परिचय और उनका वैराग्य

श्री साकेतनिवासाचार्य (टीला) जी के संप्रदाय में चौथी पीढ़ी में श्री मंगलदासाचार्य जी नामक एक महान संत का जन्म हुआ। श्री रामानंद संप्रदाय में उन्हें महर्षि अगस्त्य जी का अवतार माना जाता है। उन्होंने गुजरात के डाकोर में रामानंदी पीठ की स्थापना की। उनके दस हजार शिष्य थे, जो सभी विरक्त थे। वे जटा-जूट और अखंड भस्म धारण करते थे, शरीर पर कोई वस्त्र नहीं रखते थे, और सभी अत्यंत बलवान थे।

जब भी स्वामी जी कहीं यात्रा करते थे, उनके ये दस हजार शिष्य उनके पीछे चलते थे। यह वह समय था जब मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन चल रहा था। उस काल में गौ, ब्राह्मणों और संतों पर बहुत अत्याचार हो रहे थे, मंदिरों को तोड़ा जा रहा था और तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन कराए जा रहे थे।

अयोध्या पर संकट

औरंगजेब ने उस समय अयोध्या का नाम बदलकर फकीराबाद रख दिया था और उसे इस्लाम का सबसे बड़ा तीर्थ घोषित कर दिया था। वहाँ के कुछ इस्लामी विद्वानों का मानना था कि जहाँ एक करोड़ मुसलमान दफन हो जाते हैं, वहीं पैगंबर प्रकट होते हैं। इसलिए, उस समय हिंदुस्तान में जो भी मुसलमान मरता था, उसके शव को अयोध्या लाकर दफनाया जाता था। धीरे-धीरे पूरी अयोध्या की भूमि लाशों से भर गई।

उस समय हनुमान गढ़ी में विराजमान हनुमान जी को भी दरगाह की तरह पूजा जाता था और उनका नाम बांके पीर रख दिया गया था। हनुमान गढ़ी के पुजारी भी मुसलमान ही थे। अयोध्या की सीमा पर फकीरों ने काले इल्म (तंत्र-मंत्र) का ऐसा यंत्र लगा रखा था कि जो भी सनातन धर्मी वहाँ प्रवेश करता, उसकी सुन्नत हो जाती, जनेऊ और शिखा गायब हो जाते और उसका शरीर अपवित्र हो जाता था। इस कारण कोई भी वैष्णव, ब्राह्मण या संत वहाँ नहीं रह सका और सबने वह स्थान छोड़ दिया था।

धर्म की रक्षा के लिए महासंग्राम

जब संतों ने डाकोर पीठ में विराज रहे श्री स्वामी मंगलदासाचार्य जी को अयोध्या के इन अत्याचारों के बारे में बताया, तो वे उनकी रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना करने लगे। स्वामी जी ने तुरंत अपने दस हजार शिष्यों को अयोध्या की ओर प्रस्थान करने की आज्ञा दी। तेज धारदार अस्त्र-शस्त्र, फरसे, कुल्हाड़े, चिमटे और डंडे लेकर स्वामी जी अपने शिष्यों सहित अयोध्या पहुँचे।

अपने तपोबल से उन्होंने उन सभी तांत्रिक यंत्रों को नष्ट कर दिया। दस हजार तेजस्वी संतों को देखकर अधिकतर यवन तो भय से ही भाग गए, लेकिन जो बचे थे उन्हें स्वामी जी के शिष्यों ने मारकर अयोध्या से बाहर कर दिया।श्री भक्तमाल ४५ – श्री मंगलाचार्य जी | Shri Bhaktmal Ji – 45

जहाँ आज राम जन्मभूमि है, वहीं सभी साधुओं ने शवों के बीच बैठकर अपनी-अपनी पंचधुनि, सप्तधुनि और खप्पर धुनि प्रज्ज्वलित कर ली और तपस्या करने लगे। यह खबर बादशाह तक पहुँची तो उसने अबुल फजल नामक तांत्रिक को कुछ सैनिकों और फकीरों के साथ अयोध्या भेजा। उन सबने संतों पर अपने तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया, लेकिन उनके सारे प्रयास व्यर्थ हो गए।

श्री मंगलाचार्य जी ने अबुल फजल से कहा, “तुम्हारी सिद्धि तो निष्फल हो गई, अब तुम साधुओं की सिद्धि देखो।” स्वामी जी ने संकल्प किया और संकल्प करते ही उस तांत्रिक और उसके साथियों के शरीर में भयंकर जलन होने लगी। वे सब तुरंत स्वामी जी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे। स्वामी जी ने उनसे कहा, “यदि अपना कल्याण चाहते हो तो श्री अयोध्या पंचकोसी से बाहर चले जाओ।” वे सब तत्काल वहाँ से भाग गए।

अयोध्या का उद्धार और भगवान का वरदान

इसके बाद श्री मंगलाचार्य जी ने अपने शिष्यों से कहा, “यह हमारे इष्टदेव की भूमि है। भजन-साधना तो जीवन भर होती ही रहेगी, लेकिन आज हमें अयोध्या धाम की सेवा करनी है।”

उन्होंने सभी कब्रें खुदवाकर उनके शवों को सरयू नदी में बहा दिया। शास्त्रों में सरयू नदी का बहुत माहात्म्य है, और उस पावन जल के स्पर्श से सभी मृतकों को मोक्ष प्राप्त हुआ। फिर, आसपास के लोगों ने साधुओं के साथ मिलकर एक ही दिन में पूरी अयोध्या को साफ किया और सभी मंदिर-मठों को उनकी पुरानी स्थिति में लौटा दिया गया।

जब यह कार्य पूरा हो गया, तो श्री मंगलाचार्य जी ने अपने दस हजार शिष्यों के साथ रामघाट पर सरयू जी में स्नान किया। उस समय, स्वयं श्री रघुनाथ जी प्रकट हुए और उन्होंने स्वामी जी को हृदय से लगा लिया। उन्होंने कहा, “आपने मेरी अयोध्या को मुक्त किया है। जो वरदान चाहो, माँग लो।”

श्री मंगलाचार्य जी ने बड़ी विनम्रता से कहा, “हे नाथ! आपने जिस रूप में हमें दर्शन दिए हैं, उसी रूप में आप इस स्थान पर कृपा करके विराजमान हो जाइए।” वे रघुनाथ जी आज भी अयोध्या में विग्रह रूप में दर्शन दे रहे हैं।

यह गाथा हमें सिखाती है कि धर्म और आस्था की रक्षा के लिए एक संत को जरूरत पड़ने पर शस्त्र और शौर्य का भी सहारा लेना पड़ता है, और सच्ची भक्ति की शक्ति हर तरह के छल और अत्याचार को हरा सकती है।