श्री भक्तमाल का यह प्रसंग श्री सनातन गोस्वामी जी के अलौकिक वैराग्य और भगवान से उनके सहज प्रेम को दर्शाता है। यह कहानी बताती है कि कैसे एक सच्चे संत के लिए नाम और नामी (भगवान) में कोई अंतर नहीं होता और वे अपनी भक्ति में इतने लीन होते हैं कि स्वयं भगवान को भी उनके पास रहना पड़ता है।
अद्भुत वैराग्य और भक्ति
संतों के जीवन में एक अद्भुत बात यह होती है कि वे भगवान से भी अधिक उनके नाम से प्रेम करते हैं। भले ही स्वयं भगवान क्यों न उनकी भक्ति में विघ्न डालने की कोशिश करें, वे अपने नाम जप को कभी नहीं छोड़ते। श्री सनातन गोस्वामी जी ऐसे ही एक उच्च कोटि के संत थे। उनका वैराग्य इतना गहरा था कि वे महीने में एक बार ही मथुरा के ब्राह्मणों से एक सूखी रोटी भिक्षा में माँगते थे। उस रोटी को वे मिट्टी में दबा देते थे और लगभग 20-22 घंटे बाद, जब उन्हें बहुत भूख लगती, तो वे उसे यमुना जल में भिगोकर खाते थे।
एक दिन भिक्षा माँगते हुए वे एक भक्त मैय्या के घर पहुँचे। वहाँ उन्होंने मैय्या के साथ विराजित श्री मदनमोहन जी के दर्शन किए। दर्शन करते ही वे इतने भाव-विभोर हो गए कि उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह मैय्या भी बहुत बड़ी भक्त थीं और ठाकुर जी उनके साथ अनेक लीलाएँ करते थे। जब भी श्री सनातन गोस्वामी जी का मन मदनमोहन जी के दर्शन के लिए व्याकुल होता, तो वे उसी मैय्या के घर जाकर दर्शन करते थे।
चंचल ठाकुर जी और सनातन गोस्वामी का प्रेम
मैय्या यह समझ गईं कि बाबा सनातन गोस्वामी को उनके मदनमोहन जी से आसक्ति हो गई है। मैय्या ने उनसे कहा, “बाबा, इस काले से दिल मत लगाना। इसके उत्पातों से मैं तंग आ गई हूँ। यह बड़ा शैतान छोरा है, कभी धूल-मिट्टी में खेलता है, तो कभी कपड़े फाड़ देता है। इसने तो मेरा सारा परिवार, मेरा संसार छीन लिया है और अब मैं अकेली बची हूँ। मेरा सारा समय बस इसी के पीछे बीत जाता है।”
श्री सनातन गोस्वामी जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैय्या, हमारा तो वैसे भी सब कुछ छूट गया है। हम तो एक लंगोटी के बाबाजी हैं और इन्हीं से प्रेम करने के लिए तो हम ब्रज में रहते हैं।”

मैय्या उनकी बात सुनकर बहुत खुश हुईं और बोलीं, “तो बाबा, अगर ऐसी ही बात है, तो इस चंचल छोरे को अपने साथ ले जाओ।”
इस तरह, श्री सनातन गोस्वामी जी मदनमोहन जी को अपने साथ ले आए और उन्हें यमुना किनारे आदित्य टीला पर विराजित किया। वे खुद आटा माँगकर लाते और उसकी टिक्की बनाकर अपने हाथों से भगवान को खिलाते थे।
भगवान की इच्छा और भक्त का वैराग्य
एक दिन भगवान मदनमोहन जी बोले, “बाबा, आपके हृदय में मेरे लिए बहुत भाव है, और उस भाव के कारण आपकी बनाई टिक्की में बहुत स्वाद आता है, लेकिन अगर इसमें थोड़ा रामरस (नमक) भी पड़ जाए तो स्वाद और भी बढ़ जाएगा।” सनातन गोस्वामी जी उनकी बात मानकर अब भिक्षा में नमक भी माँगने लगे।
कुछ दिनों बाद, भगवान फिर बोले, “बाबा! टिक्की का स्वाद तो बहुत अच्छा है, लेकिन यह बड़ी सूखी है। अगर इसमें थोड़ा घी पड़ जाए, तो यह सरलता से गले से नीचे उतर जाएगी।”
यह सुनकर सनातन गोस्वामी जी समझ गए कि भगवान अपनी माया दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब हम समझ गए कि तुम मायापति हो। आज घी माँगोगे, कल रसगुल्ला, परसों पकौड़ा, खीर माँगोगे। हम तो भजन करने के लिए बाबाजी बने हैं। तुम्हारे बढ़िया-बढ़िया भोग के चक्कर में हमारा भजन छूट जाएगा। अब इसकी व्यवस्था तुम स्वयं करो।”
ठाकुर जी की लीला और मंदिर का निर्माण
एक दिन आगरा जा रहे एक व्यापारी की नमक से भरी नाव यमुना नदी के किनारे अटक गई। बहुत कोशिशों के बाद भी वह नाव नहीं हिल रही थी। तभी एक बालक ने वहाँ आकर व्यापारी से कहा, “चिंता मत करो। यहाँ आदित्य टीला पर एक बाबा भजन करते हैं। तुम उनका दर्शन कर लो, सब ठीक हो जाएगा।”
व्यापारी ने श्री सनातन गोस्वामी जी के चरणों में प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई। सनातन गोस्वामी जी ने ठाकुर जी की ओर इशारा किया और बोले, “उनसे जाकर प्रार्थना करो, वही सब कुछ करने में समर्थ हैं।” व्यापारी ने मदनमोहन जी के दर्शन किए और मन में संकल्प किया कि अगर उसकी नाव निकल गई और सारा सामान बिक गया, तो वह इनका एक सुंदर मंदिर बनवाएगा।
जैसे ही व्यापारी अपनी नाव में चढ़ा, नाव चलने लगी। चमत्कार यह हुआ कि उसका सारा नमक कपूर में बदल गया और बाजार में बहुत ऊँचे दाम पर बिक गया। व्यापारी ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। उसने ठाकुर जी के लिए लाल पत्थर का एक भव्य मंदिर बनवाया और नित्य छप्पन भोग की व्यवस्था भी कर दी। उसने कुछ खेती की जमीन और गौएँ भी दान दीं।
अब ठाकुर जी की बड़ी दिव्य सेवा होने लगी, लेकिन सनातन गोस्वामी जी की रहनी और वैराग्य में कोई अंतर नहीं आया। वे पहले की ही तरह भिक्षा माँगकर लाते और एक लंगोटी में भजन करते रहते थे। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि बाहरी सुख-सुविधाओं से बढ़कर, ईश्वर के प्रति सच्ची लगन और प्रेम ही सबसे बड़ा धन है।

