संत सेवा, गुरु भक्ति और दिव्य भावों से परिपूर्ण जीवन
श्री रासिकानंद जी, जिन्हें रासिकमुरारी जी, रासिकदेव गोस्वामी और रासिकानंद प्रभु के नामों से भी जाना जाता है, गौड़ीय वैष्णव परंपरा के एक अत्यंत पूजनीय संत थे। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र श्री अनिरुद्ध जी का अवतार माना जाता है। उनका जीवन संत सेवा, गुरु भक्ति और दिव्य भावों से ओत-प्रोत था।
जन्म और बाल्यकाल
श्री रासिकमुरारी जी का जन्म शक संवत् १५१२ (लगभग १५९० ईस्वी) में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की मंगल बेला में उड़ीसा के रोहिणीनगर (मल्लभूमि) में हुआ था। उनके पिता श्री अच्युत पट्टनायक एक जमींदार होते हुए भी अत्यंत भगवद्भक्त थे, और माता भवानी देवी एक पतिव्रता एवं सद्गृहिणी थीं। ज्योतिषियों ने बालक का नाम रसिक रखा, जो उसके महापुरुष होने के लक्षणों को दर्शाता था। पिता के मन में मुरारी नाम रखने की इच्छा थी, इसलिए संयुक्त रूप से उनका नाम रासिकमुरारी रखा गया।
अन्नप्राशन के अवसर पर, जब बालक को विभिन्न वस्तुओं में से किसी एक को चुनने के लिए छोड़ा गया, तो उन्होंने अपना हाथ श्रीमद्भागवत पर रखा। इस घटना से सभी को यह दृढ़ विश्वास हो गया कि यह बालक एक महान भागवत और भक्त होगा। बाल्यकाल से ही उनका संतों के प्रति गहरा लगाव था। जब भी कोई संत गाँव में आता, वे अपने नन्हे हाथों में जो कुछ भी मिलता, उसे भरकर संतों को भिक्षा के रूप में देते। श्रीमद्भागवत के गोपीगीत प्रसंग के दौरान वे मूर्छित हो जाते थे, जो भगवद्-नाम के प्रति उनके गहरे अनुराग को दर्शाता था।
श्री गुरुदेव भगवान् की कृपा
श्री रासिकमुरारी जी एक ऐसे सद्गुरु की प्राप्ति के लिए व्याकुल थे जो उन्हें आध्यात्मिक मार्ग का निर्देश दे सके। एक दिन वे घंटाशीला के एक निर्जन स्थान पर ध्यान में मग्न थे, तभी उन्हें एक आकाशवाणी सुनाई दी: “हे मुरारी, तुम चिंता मत करो, तुम्हें श्री श्यामानंद जी के चरणों की प्राप्ति होगी। वे ही तुम्हारे श्री गुरुदेव हैं। तुम शीघ्र ही उनके दर्शन पाओगे।”
इस आकाशवाणी से अत्यंत उत्साहित और आनंदित होकर, श्री रासिकमुरारी जी ‘श्री श्यामानंद’ प्रभु के नाम का निरंतर जप करने लगे। उनकी हृदय की तड़प और व्याकुलता देखकर, कुछ दिनों बाद रात्रि के अंतिम प्रहर में श्री श्यामानंद प्रभु ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिए और आश्वासन दिया कि प्रात:काल उनके दर्शन होंगे।
अगली सुबह, श्री रासिकमुरारी जी अत्यंत आतुरता से देख रहे थे, तभी उन्होंने श्री श्यामानंद प्रभु को किशोर दास आदि भक्तों से घिरे हुए, श्री नित्यानंद और श्री चैतन्य प्रभु के नामों का उच्चारण करते हुए अपनी ओर आते देखा। जिन गुरुदेव के लिए वे इतने दिनों से तड़प रहे थे, आज साक्षात दर्शन पाकर वे उनके चरणों में गिर पड़े। श्री श्यामानंद प्रभु ने उन्हें उठाया, आलिंगन किया और श्री महामंत्र दीक्षा प्रदान की। श्री श्यामानंद जी से ही रासिकमुरारी जी को व्रज तत्व और सम्प्रदाय रहस्य का ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने गुरुदेव के साथ व्रज के तीर्थों की यात्रा की और उनके तात्विक दर्शन किए। तत्पश्चात वे उत्कल देश गए, जहाँ उन्होंने अनेक विमुखों को भक्त बनाया और अंतिम समय तक भगवान श्री जगन्नाथ जी की सेवा में रत रहे।
विलक्षण संत सेवा
श्री रासिकमुरारी जी अत्यंत बड़े पैमाने पर संत सेवा करते थे। वे संतों के चरणोदक से भरे हुए मटके घर पर रखते थे, जिसे वे प्रणाम करते, पूजते और हृदय में धारण करते थे। उनके यहाँ जो भी संत-वैष्णव आते, उन्हें अपार सुख मिलता था। वे बड़े समारोह से गुरु उत्सव मनाते थे, जिसमें पूरे दिन कीर्तन, सत्संग, और भोज-भंडारे का आयोजन होता था, जो बारह दिनों तक लगातार चलता था।
एक बार भंडारे के दौरान, उन्होंने एक शिष्य की संतों के प्रति भाव की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वह संतों का चरणामृत ले आए। जब शिष्य ने केवल कुछ संतों का ही चरणामृत लाया, तो रासिकमुरारी जी ने पूछा कि चरणामृत में पहले जैसा स्वाद क्यों नहीं आ रहा है। शिष्य ने स्वीकार किया कि उसने एक कोढ़ी संत का चरणामृत नहीं लिया था। रासिकमुरारी जी स्वयं उस कोढ़ी संत को ढूंढने निकले, जो वृक्ष की छाया में बैठे थे। कोढ़ी होने के बावजूद उनके मुख पर एक अद्भुत तेज था। रासिकमुरारी जी ने उनके चरणों में दंडवत प्रणाम किया और क्षमा याचना की। कोढ़ी संत उनके इस भाव को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। रासिकमुरारी जी ने स्वयं उस संत का चरणामृत पान किया, जिससे उन्हें अपार सुख मिला और उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे।

संत सेवा और गुरुआज्ञा का पालन
एक बार राजाओं के बीच उपदेश देते समय, एक संत ने अपनी थाली रासिकमुरारी जी पर फेंक दी और उन्हें गालियाँ दीं, क्योंकि रसोइए ने उन्हें अधिक प्रसाद नहीं दिया था। रासिकमुरारी जी ने शांतिपूर्वक गालियाँ सुनीं और एक लड्डू उनके मुख में जाने पर उसे ‘सीथ-प्रसादी’ (गुरु का बचा हुआ प्रसाद) मानकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस रसोइए को सेवा से हटा दिया, क्योंकि उसका भाव शुद्ध नहीं था।
श्री श्यामानंद प्रभु का आश्रम बानपुर नामक गाँव की एक जमीन पर था, जिसकी खेती से प्राप्त अन्न साधु-सेवा के लिए धारेन्दा स्थान पर आता था। जब एक दुष्ट नवाब ने उस जमीन को अपने अधिकार में लेने का आदेश दिया, तो श्री श्यामानंद जी ने श्री रासिकमुरारी जी को पत्र लिखकर बुलाया। रासिकमुरारी जी भोजन करते हुए ही, बिना आचमन किए, गुरुदेव के पास पहुँच गए। गुरुदेव ने उनके इस उत्कृष्ट गुरुभक्ति भाव को देखकर उन्हें नवाब के पास भेजा।
मार्ग में उन्हें एक मतवाले हाथी ने रोका, जिसे नवाब ने उन्हें कुचलने के लिए भेजा था। रासिकमुरारी जी ने निर्भय होकर हाथी को ‘हरे कृष्ण’ का नाम सुनाया। हाथी के हृदय में प्रेम भर गया, उसने रासिकमुरारी जी के चरणों में प्रणाम किया। रासिकमुरारी जी ने उसे गोपालदास नाम दिया और उसे संत सेवा में लगा दिया। इस घटना से नवाब को अपनी भूल का अहसास हुआ, उसने जमीन लौटा दी और हाथी भी रासिकमुरारी जी को भेंट कर दिया।
हाथी गोपालदास जी की संतों के प्रति भक्ति
गोपालदास हाथी श्री रासिकमुरारी जी का परम भक्त बन गया। वह बड़े ही निष्ठापूर्वक संतों की सेवा करता था। वह बनजारों से अनाज खरीदकर संतों के लिए लाता था। जब कुछ बनजारों ने शिकायत की कि गोपालदास जबरदस्ती उनका माल ले जाता है, तो रासिकमुरारी जी ने उसे समझाया। तब से गोपालदास रुपए देकर सामान खरीदने लगा। उसका नियम था कि वह संतों की सीथ-प्रसादी (बचे हुए प्रसाद) के बिना जल भी ग्रहण नहीं करता था।
एक बार बंगाल के नवाब शाहशुजा ने गोपालदास हाथी को पकड़ने का आदेश दिया। एक नकली साधु, लालच में आकर गोपालदास को पकड़ने चला। गोपालदास ने उसके नकली वेश को पहचान लिया, पर संतों के प्रति निष्ठा के कारण उसके साथ चल दिया। नवाब के यहाँ संतों की सीथ-प्रसादी न मिलने पर, गोपालदास ने गंगा के जल में प्रवेश कर अपने गुरुदेव का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
वैकुंठ गमन लीला
अपना कार्य पूर्ण होने पर, श्री रासिक जी को जगत से जाने की इच्छा हुई। शक संवत् १६५२ (लगभग १७३० ईस्वी) में, अपने तिरोभाव से पूर्व, श्री रासिक जी अपने सात सेवकों के साथ रेमुणा पहुँचे, जहाँ प्रसिद्ध खीरचोरा गोपीनाथ जी का मंदिर है। देखते ही देखते श्री रासिक जी गोपीनाथ जी के विग्रह में विलीन हो गए। उनके शिष्यों ने भी गुरुदेव के विरह में वहीं पर अपने शरीर त्याग दिए। आज भी रेमुणा में खीरचोरा गोपीनाथ के आँगन के एक ओर श्री रासिक मुरारी जी की पुष्प समाधि है, और साथ ही उनके सात सेवक भक्तों की समाधि भी है। श्री रासिक जी के तिरोभाव के उपलक्ष में रेमुणा में प्रत्येक वर्ष बारह दिन का विशेष महोत्सव मनाया जाता है, जो माघ महीने में शिव चतुर्दशी से प्रारंभ होता है।
श्री रासिकमुरारी जी की यह जीवन-लीला हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, गुरु सेवा और संतों के प्रति अटूट श्रद्धा से व्यक्ति इस संसार सागर से पार होकर भगवत्-धाम को प्राप्त कर सकता है।
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