श्री भक्तमाल – ३६: श्री स्वामी हरिदास जी | Shri Bhaktmal Ji – 36

श्री-भक्तमाल-३६---श्री-स्वामी-हरिदास-जी-sri-haridas-ji

निधिवन के रसिक संत और बांके बिहारी जी के प्राकट्यकर्ता


श्री स्वामी हरिदास जी, जिन्हें ‘कलियुग के ललिता स्वरूप’ के रूप में जाना जाता है, वैष्णव परंपरा के एक ऐसे रसिक संत थे जिन्होंने वृंदावन की आध्यात्मिक भूमि को अपनी दिव्य लीलाओं से और भी अलौकिक बना दिया। उनका जीवन युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की नित्य सेवा और उनके प्रेम के आस्वादन में व्यतीत हुआ।

१. प्राकट्य का हेतु

एक दिन, ठाकुर जी अत्यंत प्रसन्न थे और मुस्कुरा रहे थे। श्री प्रिया जी (राधारानी) ने इसका कारण पूछा। ठाकुर जी ने बताया कि नारद जी की कलयुग में भक्ति स्थापना की प्रतिज्ञा पूरी होती दिख रही है, जिसके माध्यम से अनगिनत जीव उनके चरणों तक पहुँच रहे हैं। प्रिया जी ने कहा कि आपने भक्ति का मार्ग तो खोल दिया है, पर जो जीव सखी बनकर निज महल (राधा-कृष्ण का धाम) की सेवा प्राप्त करना चाहते हैं, उस मार्ग को आपने गुप्त रखा है।

ठाकुर जी ने कहा कि यह रस तो आपकी सहचरियों (सखियों) की कृपा और करुणा पर ही निर्भर है। यदि वे अनुग्रह न करें, तो मुझे भी श्रीमहल की सेवा दुर्लभ है।

जब श्री श्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) के बीच यह रसमयी वार्ता चल रही थी, तभी वहाँ श्री ललिता जी पधारीं। युगल की प्रेमपूर्ण दृष्टि उन पर पड़ी। ललिता जी ने पूछा कि वे दोनों उन्हें इतने स्नेह से क्यों निहार रहे हैं और उनकी क्या आज्ञा है। युगल ने कहा, “तुम एक अंश से पृथ्वी पर अवतार ग्रहण करो और ‘महल टहल’ (निज महल की सेवा) का अत्यंत दुर्लभ मार्ग खोलो।” इस प्रकार, श्री स्वामी हरिदास जी के रूप में ललिता जी का प्राकट्य हुआ।

२. जन्म और दीक्षा

श्री स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत् १५३७ विक्रमी को वृंदावन से आधे कोस दूर राजपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गंगाधर और माता का नाम श्री चित्रा देवी था। उनका मन सांसारिक विषयों में बिल्कुल नहीं लगता था। उनके गुरुदेव, श्री आशुधीर जी, एक सिद्ध महात्मा थे, जिन्होंने बाल्यकाल में ही स्वामी हरिदास जी के पिता को बता दिया था कि यह बालक ललिता जी का अवतार है और समय आने पर यह भजन करने निकल पड़ेगा, तब इसे रोकना-टोकना नहीं।

एक बार पिता ने बालक हरिदास जी से उनके असली स्वरूप के दर्शन कराने का आग्रह किया। स्वामी हरिदास जी ने उन्हें साक्षात् ललिता जी के रूप में दर्शन देकर कृतार्थ किया था। २५ वर्ष की अवस्था में, उन्होंने विरक्त की भाँति घर त्याग दिया और वृंदावन आ गए। वहाँ उन्होंने निम्बार्क संप्रदाय के एक संत, श्री आशुधीर देवाचार्य जी से दीक्षा ली, विरक्त वेश धारण किया और भजन करने लगे।

३. श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य

स्वामी जी ने निधिवन को अपनी साधना स्थली बनाया और निरंतर श्री युगल की रास-लीला का दर्शन किया। जहाँ भी वे विराजमान होते, एक परम सुरम्य लता-कुंज की ओर एकाग्र दृष्टि रखते। कभी वे उस ओर देखकर हँसते, कभी भाव-विभोर होकर रोते, कभी वहीं लोट जाते, और कभी उसकी ओर देखकर राग गाते।

उनके शिष्य श्री विट्ठल विपुल देव जी ने एक दिन पूछा, “हे गुरुदेव! आपकी दृष्टि सदा इस विशेष कुंज की ओर क्यों रहती है और आप भाव-विभोर क्यों हो जाते हैं?” स्वामी जी ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की। उन्होंने देखा कि दिव्य रंग-महल में श्री श्यामा-श्याम एक होकर कुसुम-सेज पर प्रेम-विहार कर रहे हैं। उस अलौकिक रूप को देखकर विट्ठल विपुल देव जी भाव-विभोर हो गए। उन्होंने स्वामी जी से प्रार्थना की कि उन्हें इस स्वरूप का दर्शन सदा होता रहे।

स्वामी जी ने श्यामा-श्याम को राग गाकर पुकारा। देखते ही देखते एक प्रकाश-पुंज प्रकट हुआ, जिसमें से श्री बांके बिहारी जी का श्रीविग्रह बाहर आया। आज बांके बिहारी जी के मंदिर में इसी श्रीविग्रह का दर्शन होता है।

 

४. परिकर को महारास का दर्शन कराना

एक बार शरद पूर्णिमा की पवित्र तिथि पर, स्वामी जी ने यमुना जी के दूसरी ओर मानसरोवर नामक स्थान पर अपने सभी शिष्यों (परिकर) को महारास का दर्शन कराया।

५. होली लीला और विज्ञानी जी

लाहौर में विज्ञानी जी नामक एक सेठ भक्त रहते थे। एक दिन उनके घर श्री ऋषिकेश दास जी नामक एक ब्रजवासी महात्मा पधारे। सत्संग के दौरान, संत ने बताया कि वृंदावन श्री श्यामा-श्याम की नित्य लीला स्थली है, जहाँ वे निरंतर लीला करते हैं और रसिकजन उसका आस्वादन करते हैं। विज्ञानी जी ने पूछा कि क्या आजकल कोई ऐसे संत हैं जो प्रकट रूप में उस नित्य विहार का खुली आँखों से निरंतर दर्शन करते हों।

संत ने कहा कि ब्रज रसिक संतों की खान है, और स्वामी हरिदास जी महाराज ऐसे महान रासिकाचार्य हैं जिन्होंने श्री बांके बिहारी जी को प्रकट किया है। वे निधिवन में रहकर युगल सरकार की नित्य सेवा करते हैं और उनके दर्शन करते हैं। विज्ञानी जी ने पूछा कि क्या उन्हें स्वामी जी के दर्शन हो सकते हैं। संत ने कहा कि स्वामी जी का दर्शन दुर्लभ है, पर एक प्रेमी भक्त होने के नाते उन्हें दर्शन हो सकते हैं।

विज्ञानी जी ने पूछा कि क्या स्वामी जी उनकी कोई भेंट स्वीकार करेंगे। संत ने बताया कि वे धन-दौलत स्वीकार नहीं करते, परंतु सुगंध और राग (संगीत) ठाकुर सेवा के लिए स्वीकार करते हैं। विज्ञानी जी ने कहा कि वे गाना नहीं जानते, पर बढ़िया इत्र भेंट करेंगे। उन्होंने उस ज़माने में एक लाख रुपये का इत्र बनवाया।

संत ऋषिकेश दास और विज्ञानी जी वृंदावन आए। निधिवन में जाकर उन्होंने बिहारी जी को प्रणाम किया और सेवक से स्वामी हरिदास जी के दर्शन की इच्छा जताई। सेवक ने बताया कि स्वामी जी यमुना तट पर गए हुए हैं।

विज्ञानी जी की दर्शन की लालसा इतनी तीव्र थी कि वे तुरंत यमुना पुलिन की ओर दौड़ पड़े। वहाँ उन्होंने देखा कि स्वामी जी श्री श्यामा-श्याम की होली लीला का दर्शन कर रहे हैं। श्री राधारानी के हाथ में एक कमोरी थी जिसमें केसर मिश्रित जल था, और वे ठाकुर जी पर डालने वाली थीं। परंतु नटखट ठाकुर जी ने चतुराई से वह कमोरी राधारानी के ही ऊपर उलट दी। अब राधारानी का रंग समाप्त हो गया था।

राधारानी ने स्वामी हरिदास जी (जिन्हें वे ललिता का अंश मानते थे) की ओर देखा। उसी समय विज्ञानी जी ने स्वामी जी को साष्टांग दंडवत किया और इत्र की शीशी भेंट की। स्वामी जी, जो भाव-विभोर थे, ने वह इत्र तुरंत राधारानी की कमोरी में डाल दिया और कहा, “स्वामिनी जू! अब हमारी जीत पक्की।” राधारानी ने उस इत्र से ठाकुर जी पर रंग डाला।

विज्ञानी जी को यह लीला बाहर से नहीं दिखी। उन्होंने देखा कि स्वामी जी ने इत्र को यमुना की रज (धूल) में डाल दिया। वे सोचने लगे कि यह महात्मा बड़े विचित्र हैं, उन्होंने इत्र को सूंघा भी नहीं और रज में डाल दिया।

जब स्वामी जी भाव-राज्य से बाहर आए, तो सेवक ने बताया कि यह भक्त लाहौर से दर्शन करने आए हैं। स्वामी जी ने कहा, “हमारा दर्शन क्या करना? जाकर निधिवन में बिहारी जी का दर्शन करो।” विज्ञानी जी ने कहा कि वे पहले निधिवन से ही आए हैं। स्वामी जी ने कहा, “जाओ, पुनः दर्शन करो।”

जैसे ही वे निधिवन में प्रवेश करने लगे, उन्हें अत्यंत सुंदर सुगंध आने लगी। पूरा निधिवन महक रहा था। अंदर जाकर जब उन्होंने बिहारी जी का दर्शन किया, तो देखा कि ठाकुर जी के संपूर्ण श्रीअंगों और वस्त्रों से वही इत्र टपक रहा है। उस लीला के दर्शन से उन्हें बड़ी कृपा का अनुभव हुआ।

श्री-भक्तमाल-३६---श्री-स्वामी-हरिदास-जी-sri-haridas-ji

६. ब्राह्मण दयाराम जी पर कृपा

जसरोटा (पंजाब-कश्मीर सीमा) क्षेत्र में एक अत्यंत निर्धन सारस्वत ब्राह्मण, श्री दयाराम जी, रहते थे। धन की कामना से वे जम्बू पर्वत पर तपस्या करने लगे। वहाँ उनकी भेंट भगवान राम के पार्षद श्री जाम्बवान जी से हुई। जाम्बवान जी ने उन्हें एक पारस मणि प्रदान की, जो लोहे को सोना बना देती थी, और कहा कि यह १२ वर्ष तक ही उनके पास रहेगी।

ब्राह्मण ने उस मणि से बहुत लोगों की सहायता की, अन्न-धान दान किया और संत सेवा की। १० वर्ष पूरे होने पर, उन्होंने एक सत्पात्र की खोज शुरू की। यात्रा के दौरान उनकी पत्नी का देहांत हो गया। वे विचरण करते-करते वैद्यनाथ धाम पहुँचे, जहाँ शंकर जी ने उन्हें स्वप्न में बताया कि जो महापुरुष बार-बार मना करने पर भी मणि को स्वीकार न करे, वही सत्पात्र है।

उन्होंने कई महात्माओं से संपर्क किया, पर मणि का नाम सुनते ही वे उन्हें चेला बनाने को तैयार हो जाते। ब्राह्मण बिना बताए गायब हो जाते। अंततः वे वृंदावन स्वामी जी के पास पहुँचे। ब्राह्मण ने स्वामी जी से दीक्षा माँगी और पारस मणि भेंट करने की बात कही।

स्वामी जी ने कहा, “भगवत् शरणागति तो मैं तुम्हें प्रदान कर दूँगा, पर पहले इस पारस मणि को यमुना जी में फेंक दो।” ब्राह्मण ने वैसा ही किया, और स्वामी जी ने उन्हें दीक्षा देकर श्री दयालदास जी नाम रखा।

श्री दयालदास जी के मन में कभी-कभी विचार आता कि उनके पास दो वर्ष और मणि होती तो वे और सेवा कर सकते थे। एक दिन यमुना स्नान के समय, स्वामी जी ने उनसे यमुना की थोड़ी रज (धूल) लाने को कहा। जब दयालदास जी ने रज की पोटली खोली, तो रज के कण मोटे-मोटे पारस के रूप में परिवर्तित हो चुके थे। स्वामी जी ने कहा, “लो, तुम्हें कितने पारस चाहिए।”

तब दयालदास जी को समझ आया कि असली पारस (पारस मणि) यह पत्थर नहीं, बल्कि युगल नाम और उनके गुरुदेव ही हैं। इस घटना के पश्चात् धन की वासना सदा के लिए समाप्त हो गई।

७. सीथ प्रसादी का माहात्म्य

एक दिन स्वामी जी प्रसाद पाने के बाद दोना (पत्ते का पात्र) फेंकने जा रहे थे। बाहर बैजू बावरा बड़े भाव से दोनों हाथ सामने करके खड़ा था। दोने में प्रसाद का एक भी कण न बचा था, इसलिए स्वामी जी ने सोचा कि उसने दोना माँगा होगा। उन्होंने उसे दोना दे दिया। बैजू बावरा ने श्रद्धापूर्वक उसे चबाकर खाया। स्वामी जी को उस पर दया आई कि उसे सीथ प्रसाद (गुरु द्वारा खाए गए पात्र का जूठा) पाने की इच्छा थी, पर उसे मिला नहीं। स्वामी जी की करुणाभरी दृष्टि पड़ते ही बैजू बावरा के हृदय में समस्त राग-रागिनियाँ (संगीत) प्रकट हो गईं।

८. तानसेन पर कृपा

तानसेन (राम-तनु पांडे) रीवा नरेश श्री राजाराम बघेला के दरबार के मुख्य गायक थे। उन्हें दीपक राग सिद्ध था, जिससे वे अपने आसपास की हवा में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न कर सकते थे। एक बार राजा के कहने पर, तानसेन ने दीपक राग गाया। इससे सभा में इतनी गर्मी बढ़ गई कि तानसेन स्वयं जलने लगे और नदी में कूद गए, पर शांति नहीं मिली।

वन में भटकते हुए वे ताना और रीरी नाम की दो बहनों के पास पहुँचे, जो कंडा बीन रही थीं। उन्होंने तानसेन की स्थिति देखकर पहचान लिया कि वे दीपक राग से पीड़ित हैं। उन्होंने मेघ मल्हार राग गाकर वर्षा करवाई, जिससे तानसेन की अग्नि शांत हुई। तानसेन ने उनसे राग की साधना सिखने का अनुरोध किया।

उन बहनों ने कहा कि वे उन्हें क्या सिखाएँगी, उन्हें तो केवल थोड़ा ज्ञान है। उन्होंने तानसेन को वृंदावन में निधिवन में विराज रहे स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में जाने की सलाह दी, जिनकी कृपा से उन्हें संपूर्ण संगीत साधना मिल सकती है।

तानसेन स्वामी हरिदास जी की शरण में आए और उनसे संगीत सीखा। जब उन्होंने अकबर के दरबार में गाना सुनाया, तो अकबर ने उन्हें मुख्य गायक नियुक्त कर दिया। जब वे अपने गाँव लौटे, तो ब्राह्मणों ने उन्हें ‘यवनों’ (मुसलमानों) के बीच रहने के कारण जाति से बहिष्कृत कर दिया। उन्होंने अपनी पवित्रता और भक्ति का प्रमाण दिया, पर ब्राह्मण नहीं माने। तब से वे दिल्ली दरबार में ही रहने लगे। अकबर ने उनकी शादी अपने मौलवी की दो बेटियों से करवाई, जिनसे संगीत के कई घराने उत्पन्न हुए।

९. अकबर पर कृपा

एक दिन अकबर ने तानसेन से कहा कि उनसे अच्छा गायक पृथ्वी पर कोई नहीं है। तानसेन ने कहा कि संगीत के अगाध समुद्र तो उनके गुरुदेव स्वामी हरिदास जी हैं, वे तो उस समुद्र की एक बूँद भी नहीं हैं। अकबर ने स्वामी जी के बारे में सुनकर उन्हें वृंदावन से दिल्ली बुलाने की इच्छा जताई।

तानसेन ने कहा कि वे निष्काम महात्मा हैं और छोटे दरबारों में नहीं आते। अकबर ने स्वयं उनके पास चलने की इच्छा जताई। तानसेन ने समझाया कि शाही ठाठ-बाट से जाने पर दर्शन नहीं होंगे, बल्कि उनके किसी निकट शिष्य के साथ अत्यंत साधारण वेश में जाना होगा। अकबर ने सेवक बनकर चलने की बात स्वीकार की।

तानसेन स्वामी जी के पास पहुँचे और प्रणाम किया। अकबर बाहर सेवक के वेश में खड़ा रहा। स्वामी जी ने तानसेन से बिहारी जी के लिए कुछ गाने को कहा। तानसेन ने जानबूझकर सुर गलत लगाया। स्वामी जी ने उनकी गलती बताई। तानसेन ने कहा, “आप कृपा करके इस सुर को सही गाकर सुनाएँ।”

स्वामी जी ने गाना शुरू किया। उनके गान को सुनकर अकबर भूल गया कि वह बाहर सेवक के वेश में खड़ा है। वह जोर से बोला, “वाह! वाह! क्या गाते हैं, यह तो खुदा का चमत्कार है!” स्वामी जी ने पूछा, “बाहर कौन है?” तानसेन ने बताया कि वे बादशाह अकबर हैं।

स्वामी जी ने अकबर को अंदर बुलाया। बादशाह ने स्वामी जी को रत्नों का हार भेंट किया। स्वामी जी ने वह हार अपने पास खड़े हिरण के बच्चे के गले में डाल दिया, और वह वन में भाग गया। अकबर यह देखकर चकित हुआ। स्वामी जी ने उसकी मन की बात जान ली और हजारों हिरणों को बुलवाया, जिनके गले में वैसी ही मालाएँ थीं।

अकबर ने सेवा का अवसर माँगा। स्वामी जी ने कहा, “यहां किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है।” पर अकबर के बार-बार आग्रह करने पर, उन्होंने कहा कि यमुना जी के धीर-समीर घाट की सीढ़ी का एक कोना टूट गया है, उसकी मरम्मत करवा दो।

अकबर धीर-समीर घाट गया और सीढ़ी देखकर मूर्छित हो गया। जब वह होश में आया, तो उसने देखा कि सीढ़ी की हर ईंट पर कीमती रत्न जड़े हैं। उसने कहा, “महाराज, मैंने अपना पूरा खजाना खाली कर दिया, तब भी मैं उस सीढ़ी का एक कोना नहीं बनवा सकता। आपने मेरे बादशाहत के घमंड को तोड़ दिया।” उसने फिर से सेवा का अवसर माँगा। स्वामी जी ने कहा, “बंदर, मोर, हिरण, भालुओं को चना खिला दो। और वृंदावन में किसी भी पशु-पक्षी या वृक्ष की हिंसा नहीं होनी चाहिए।” अकबर ने ऐसा ही किया, और प्रतिवर्ष वृंदावन के लिए चार हजार किलो चना भेजा जाता था।

१०. एक १२०० वर्ष के योगी पर कृपा

उत्तराखंड के स्वामी पर्वतपुरी जी ने १२ वर्ष की आयु तक तपस्या करके बहुत सारी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं और अपनी आयु को १२०० वर्ष बढ़ा लिया था। उन्हें अपनी सिद्धियों पर अहंकार था। जब उन्होंने स्वामी हरिदास जी के बारे में सुना, तो वे उनकी परीक्षा लेने वृंदावन आ गए। उन्होंने कभी सिंह बनकर दहाड़ने की, तो कभी अजगर बनकर खाने की कोशिश की, पर स्वामी जी अपने भजन से नहीं हटे।

एक दिन स्वामी जी मोर-बंदरों को प्रसाद खिला रहे थे। तभी पर्वतपुरी जी मोर का रूप धारण कर प्रसाद पाने आ गए। स्वामी जी ने उन्हें पहचान लिया और कहा, “ठाकुर जी की कृपा से आपको मानव शरीर मिला, और आपमें तपस्या की सामर्थ्य है, पर आपने १२ वर्ष सिद्धियाँ पाने में गँवा दिए। इससे तो जीव का पतन होता है।”

स्वामी जी ने मोर रूपी सिद्ध महात्मा को प्रसाद दिया। बिहारी जी का प्रसाद पाते ही उसकी बुद्धि निर्मल हो गई। वह प्रकट हुआ, स्वामी जी के चरण पकड़े और कहा, “आप समर्थ संत हैं, मैं आपकी शरण में हूँ।” स्वामी जी ने उन्हें युगल मंत्र का उपदेश देकर उनका नाम श्री प्रकाश दास रख दिया।

११. श्री मधुकर शाह पर वृंदावन धाम की कृपा

एक दिन अन्नकूट महोत्सव में बिहारी जी को अन्नकूट का भोग लगाया जा रहा था। उस समय राजाराम बुंदेला और मधुकर शाह अपने गुरु श्री हरिराम व्यास के साथ वहाँ आए थे। उन्होंने देखा कि बिहारी जी को मिट्टी के पात्रों में भोग लग रहा है। मधुकर शाह के मन में आया कि यह स्वामी जी की विरक्तता के कारण होगा, वे सोने के बर्तन बनवा सकते थे।

स्वामी जी ने कहा, “यह सामान्य मिट्टी नहीं, यह ब्रजरज है। स्वर्ण इसकी बराबरी नहीं कर सकता।” राजा के मन की शंका को जान कर, स्वामी जी ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की और कहा, “एक बार विश्वास भरी दृष्टि से पुनः इन पात्रों को देखो।” राजा ने जब देखा, तो सभी पात्र दिव्य प्रकाश से युक्त चमचमाते दिखाई दिए। मधुकर शाह को उसी क्षण यह अनुभव हुआ कि ब्रजरज अनमोल है।

मधुकर शाह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि वे वृंदावन की सीमा के बाहर कभी नहीं जाएंगे। स्वामी जी ने कहा कि मुगल काल में धर्मात्मा राजा का राज्य में रहना प्रजा के लिए आवश्यक है। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि उन्हें महल में रहते हुए ही वृंदावन का अनुभव होगा। स्वामी जी के आशीर्वाद से मधुकर शाह को महल में ही नित्य वृंदावन का अनुभव होने लगा, जैसे वृंदावन वहीं प्रकट हो गया हो।

१२. संत वाणी ही परम प्रमाण

श्री आशुधीर देवाचार्य जी के शिष्य श्री देवदत्त जी महाराज वैष्णवता का प्रचार करते हुए गढ़ मुक्तेश्वर पहुँचे। वहाँ कुछ कर्मकांडी ब्राह्मणों ने उनसे शास्त्रार्थ करने का प्रयास किया। जब ब्राह्मणों ने कहा कि वे संतों की वाणियों को प्रमाण नहीं मानते, केवल वेद को मानते हैं, तब देवदत्त जी ने अपने गुरु श्री आशुधीर जी का स्मरण किया।

श्री आशुधीर जी प्रकट हुए और उन्होंने ब्राह्मणों से कहा कि स्वयं गंगा जी जिसके हाथ से प्रकट होकर पूजा ग्रहण करें, उसका मत श्रेष्ठ माना जाएगा। ब्राह्मणों ने वेदों का पाठ किया, पर गंगा जी प्रकट नहीं हुईं। तब श्री देवदत्त जी ने भाव से गाकर गंगा जी को पुकारा।

स्वयं गंगा माता प्रकट हुईं और ब्राह्मणों से कहा कि वैष्णवता और संतों की वाणी ही जीव के लिए परम कल्याणकारी है। सभी ब्राह्मण श्री आशुधीर जी के चरणों में लोट गए और उन्होंने वृंदावन जाकर स्वामी श्री हरिदास जी की शरण ग्रहण की। वे ब्राह्मण स्वामी जी से दीक्षा लेकर भजन में लीन हो गए।

 


Click here to download : Bhaktmal
Read More :

Narayanpedia पर आपको  सभी  देवी  देवताओ  की  नए  पुराने प्रसिद्ध  भजन और  कथाओं  के  Lyrics  मिलेंगे narayanpedia.com पर आप अपनी भाषा  में  Lyrics  पढ़  सकते  हो।