श्री भक्तमाल २६ – श्री भूगर्भ गोस्वामी जी | Shri Bhaktmal Ji 26

श्री भक्तमाल २६ - श्री भूगर्भ गोस्वामी जी Sri Bhugarbh Ji

श्री भूगर्भ गोस्वामी जी का जीवन एवं भगवान से उनका अद्भुत स्नेह

भक्तों की कथा सदैव हृदय को शीतल कर देती है। भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों पर कैसी-कैसी कृपा करते हैं, यह जानकर मन और अधिक भक्ति में स्थिर होता है। श्री भूगर्भ गोस्वामी जी महाराज का जीवन इसका जीवंत प्रमाण है।

श्री गोवर्धन धाम में रहने वाले भूगर्भ गोस्वामी जी का सम्पूर्ण जीवन सेवा, साधना और परिक्रमा में व्यतीत हुआ। उनके लिए गोवर्धन परिक्रमा केवल एक नियम या साधना मात्र नहीं थी, बल्कि वह तो उनके जीवन की प्राणवायु थी। चाहे मौसम कैसा भी हो, चाहे स्वास्थ्य कैसा भी हो, वह प्रतिदिन गोवर्धन की परिक्रमा करना अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते थे। यही नित्यचर्या उन्हें भगवान के और निकट ले जाती थी।

परिक्रमा का प्रसंग और परीक्षा

एक दिन वह अत्यंत प्रेमपूर्वक “कृष्ण-कृष्ण” नाम जपते हुए परिक्रमा कर रहे थे। मन तो श्री नाम में डूबा हुआ था, परन्तु देह को तो संसार का स्पर्श रहना ही होता है। चलते समय उनका पैर एक शिला से टकरा गया और घाव गहरा हो गया। रक्त बहने लगा, पीड़ा बढ़ गई और वह चलने में असमर्थ हो गए।

भूगर्भ गोस्वामी जी का मन केवल भगवान की सेवा में था। उन्हें अपने घाव या पीड़ा की चिंता उतनी नहीं थी, जितनी इस बात की कि – “सायंकाल ठाकुरजी की आरती-पूजा कैसे होगी? मैं तो चलने-फिरने में ही असमर्थ हूँ।” भक्त का यही हृदय भगवान को स्पर्श करता है।

भगवान का दयालु रूप

भगवान अपने भक्त के प्रेम को देखकर स्वयं अधीर हो जाते हैं। वह भक्त का कष्ट सहन नहीं कर पाते। उसी समय भगवान श्रीकृष्ण एक बलिष्ठ साधु का रूप धारण करके वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने भूगर्भ गोस्वामी जी से कहा – “बाबा! आपको गहरी चोट लगी है, आप मेरे कंधे पर बैठ जाइए, मैं आपको आपकी कुटिया तक पहुँचा देता हूँ।”

बाबा ने पहले मना कर दिया। उनका स्वभाव था कि वह किसी से कोई सेवा नहीं लेते थे। उन्हें लगता था कि सेवा करना तो उनका कर्तव्य है, सेवा लेना उचित नहीं। परन्तु भगवान कब मानते हैं? अंततः उन्होंने उन्हें अपने कंधे पर बैठा लिया और सीधे कुटिया तक पहुँचा दिया।

जब भूगर्भ गोस्वामी जी उन्हें धन्यवाद देने के लिए मुड़े, तब तक साधु रूपी श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो चुके थे। अब उनके हृदय में यह स्पष्ट हो गया कि यह साधारण साधु नहीं थे, बल्कि स्वयं उनके आराध्य श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने उनकी पीड़ा देखकर यह सेवा की।

भक्त की व्याकुलता

यह अनुभव प्राप्त होते ही भूगर्भ गोस्वामी जी के हृदय में आनंद के साथ-साथ एक प्रकार की वेदना भी जाग उठी। वे सोचने लगे – “हाय! यह क्या हो गया। मैं तो प्रभु की सेवा करने के लिए जन्मा था, किंतु आज तो उल्टा हो गया। मैंने प्रभु से सेवा करवा ली। यह कैसी विडंबना है?”

इस भाव से वे बार-बार रोने लगे। उनका कोमल भक्तहृदय यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि भगवान ने उनके लिए इतनी बड़ी सेवा की।

भगवान का आश्वासन

भगवान भक्त के अंतर्मन को भली-भांति जानते हैं। उन्होंने स्वप्न में प्रकट होकर कहा – “बाबा! आप व्यर्थ संकोच न करें। मेरे भक्त का दुख मैं सहन नहीं कर पाता। जब तक मैं भक्त का दुख दूर करके उसे सुखी नहीं कर देता, तब तक मुझे शांति नहीं मिलती। यह मेरी स्वभावगत प्रकृति है।”

इन अमृतमयी वचनों ने भूगर्भ गोस्वामी जी का हृदय गद्गद कर दिया। उन्हें यह अनुभव हुआ कि भगवान केवल ईश्वर ही नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में भक्तवत्सल हैं। वह भक्त की सेवा के अवसर ढूंढते हैं, भक्त को अपनी ओर खींचते हैं और हर क्षण उसकी रक्षा करते हैं।

कथा से मिलने वाली शिक्षा

इस प्रसंग से हमें कई महत्वपूर्ण बातें समझने को मिलती हैं:

नियम और निष्ठा का महत्व
भूगर्भ गोस्वामी जी ने चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, गोवर्धन परिक्रमा का नियम कभी नहीं छोड़ा। यह हमें सिखाता है कि भक्ति में दृढ़ता और नियमितता अत्यंत आवश्यक है।

भक्त का हृदय सेवा प्रधान होता है
वह अपने सुख-दुख की चिंता नहीं करता, केवल यह सोचता है कि भगवान की सेवा बाधित न हो। यही भाव भूगर्भ गोस्वामी जी के मन में था कि सायंकाल की आरती कैसे होगी।

भगवान की दया अनंत है
यह कथा सिद्ध करती है कि भगवान केवल उपदेश देने वाले नहीं हैं, बल्कि स्वयं अपने भक्तों के लिए सेवा करने को तत्पर रहते हैं। जब भक्त असहाय होता है, तब भगवान सहायक बनकर आते हैं।

भक्त का विनम्र भाव
जब भगवान ने उनकी सहायता की, तब भी भूगर्भ गोस्वामी जी ने इसे अपने लिए लज्जा का कारण माना। यह उनकी विनम्रता और सच्चे भक्त होने का प्रमाण है।

भगवान की भक्तवत्सलता
भगवान ने स्वप्न में स्वयं कहा कि उन्हें अपने भक्त का दुख सहन नहीं होता। यह कथन भक्त के लिए परम आश्वासन है कि ईश्वर सदैव हमारे साथ हैं और हमारे दुःख में हमें अकेला नहीं छोड़ते।

निष्कर्ष

श्री भूगर्भ गोस्वामी जी की कथा हमें यह अनुभव कराती है कि भगवान और भक्त का संबंध केवल पूजा-पाठ या नियमों तक सीमित नहीं है। यह तो अत्यंत गहन, प्रेममय और आत्मीयता से भरा हुआ संबंध है। जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चे का कष्ट सहन नहीं कर सकते, उसी प्रकार भगवान अपने भक्त का दुख नहीं देख सकते।

भूगर्भ गोस्वामी जी वास्तव में भगवत् कृपा के पात्र थे। उनकी भक्ति, उनका नियम, उनकी निष्ठा और उनका विनम्र भाव उन्हें महान संतों की श्रेणी में स्थापित करता है। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम भगवान का स्मरण निरंतर करें और सेवा-भाव से भक्ति करें, तो भगवान स्वयं हमारी रक्षा करेंगे और हमारे जीवन के हर कठिन क्षण में हमारे सहायक बनेंगे।

 


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