श्री भक्तमाल २४ – श्री गौरांग दास जी | Shri Bhakatmal 24

श्री भक्तमाल २४ - श्री गौरांग दास जी Shri Bhakatmal 24

श्री गौरांग दास जी

ब्रजभूमि की महिमा अपार है। यहाँ के प्रत्येक कण-कण में श्री राधा-कृष्ण की लीलाओं की सुगंध बसी हुई है। इस पावन भूमि में अनेक संत-महात्माओं ने जन्म लिया, जिन्होंने अपनी साधना और भक्ति से ब्रजवासियों और समस्त जगत को भक्ति-पथ पर चलने की प्रेरणा दी। उन्हीं सिद्ध रसिक संतों में एक महान संत हुए बाबा श्री गौरांग दास जी महाराज। उनका जीवन इस बात का साक्षात् उदाहरण है कि जब भक्त सच्चे भाव से भगवान की सेवा करता है, तो भगवान भी प्रत्यक्ष होकर उससे संवाद करते हैं।

१. सखीरूप से मानसी सेवा और रसगुल्ला प्रसंग

बाबा गौरांग दास जी बड़े ही रसिक संत थे। एक दिन उन्हें स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण ने दर्शन देकर कहा –
“मेरा विग्रह गिरिराज पर्वत के अमुक स्थान पर स्थापित है। तुम उसे वहाँ से निकालो और नित्य सेवा करो।”

बाबा ने जब प्रभु का यह आदेश सुना तो हृदय में प्रेम उमड़ पड़ा। उन्होंने पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ ठाकुर जी की सेवा आरंभ कर दी।

लेकिन धीरे-धीरे बाबा ने अनुभव किया कि ठाकुर जी केवल पूजन-अर्चन से ही संतुष्ट नहीं होते। वे तो प्रतिदिन उनसे कुछ न कुछ मांगने लगे – कभी मुकुट, कभी बंसी, कभी माखन, तो कभी सुंदर पोशाख। यह देखकर बाबा सोच में पड़ गए। वे स्वयं तो एक लंगोटीधारी साधु थे, उनके पास धन नहीं था, तो ठाकुर जी की यह सारी इच्छाएँ कैसे पूरी हों?

समाधान के लिए बाबा संत श्री जगदीश दास जी के पास पहुँचे। सब कुछ सुनकर उन्होंने समझाया –
“बाबा! आप अपनी असमर्थता ठाकुर जी से कह दीजिए और उनकी सभी मांगें मानसी सेवा में पूरी कीजिए।”

बाबा ने इस उपाय को जीवन का अंग बना लिया। वे नित्य मानसी सेवा करने लगे। अपने मन में ठाकुर जी के लिए दिव्य वस्त्र, अलंकार, स्वादिष्ट भोग सजाकर अर्पण करते।

चमत्कारी अनुभव

एक दिन बाबा ने स्नान कर भजन किया और जब उठे, तो शिष्यों ने देखा कि उनके लंगोट और कमर पर शक्कर की चाशनी लगी हुई है। सब आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने बाबा से पूछा –
“बाबा! यह चाशनी आपके वस्त्र पर कैसे लगी? आप तो स्नान करके सीधे भजन में बैठे थे।”

पहले तो बाबा ने इसे टाल दिया और कहा –
“कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ।”

लेकिन जब शिष्यों ने बार-बार आग्रह किया, तो बाबा ने अपनी मानसी सेवा का रहस्य बताया। उन्होंने कहा –
“आज मैंने सोचा कि मैं बंगाली हूँ, और बंगाल में अच्छे रसगुल्ले बनाए जाते हैं। मैंने मानसी सेवा में बड़े-बड़े सुंदर रसगुल्ले बनाकर श्री प्रिया-प्रियतम को खिलाने का संकल्प किया।”

उन्होंने आगे बताया कि कैसे मानसी रूप में गुरु-सखी के हाथों से रसगुल्ले श्री राधा-कृष्ण को अर्पित किए गए। राधारानी ने प्रेम से एक-एक टुकड़ा करके रसगुल्ला खाया, लेकिन नटखट श्रीकृष्ण ने तो एक बड़ा रसगुल्ला एक बार में ही मुख में डाल लिया। जब ठाकुर जी ने रसगुल्ला दबाया, तो रस फूटकर उनके पास खड़े सखी-रूप बाबा के शरीर पर छिटक गया। यही कारण था कि उनके बाह्य शरीर पर भी चाशनी दिखाई दी।

यह घटना स्पष्ट करती है कि मानसी सेवा केवल मानसिक कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभव है। भगवान अपने प्रिय भक्त की मानसी सेवा को भी साकार कर देते हैं।

२. सिद्ध संतों की कथा देवता भी सुनते हैं

गौरांग दास जी का जीवन केवल व्यक्तिगत भक्ति तक सीमित नहीं था। वे जब कथा कहते, तो वातावरण इतना पावन और दिव्य हो जाता कि देवता भी उस कथा को सुनने आ जाते।

एक बार वृंदावन के भागवत निवास में कथा चल रही थी। खुले प्रांगण में कथा का आयोजन हुआ था। केवल व्यासपीठ पर ही आसन बिछा था, बाकी सब श्रोता भूमि पर बैठकर रसपान कर रहे थे।

उस दिन बाबा रासलीला का वर्णन कर रहे थे। उन्होंने कहा –
“जब श्री वृंदावन बिहारी गोपियों के संग रास कर रहे थे, तब देवताओं को प्रत्यक्ष रास का दर्शन नहीं हुआ। उन्हें केवल एक अद्भुत नीला तेज दिखाई दिया। उसी तेज पर मुग्ध होकर उन्होंने पुष्पवृष्टि की।”

दिव्य पुष्पवृष्टि

जैसे ही यह प्रसंग उनके मुख से निकला, उसी क्षण आकाश से चमत्कार घटित हुआ। दिव्य, अलौकिक, सफेद और बड़े-बड़े पुष्प आकाश से बरसने लगे।

पहला पुष्प भागवत जी की पोथी पर गिरा।

दूसरा पुष्प स्वयं बाबा के सिर पर आकर ठहरा।

धीरे-धीरे पूरा परिसर पुष्पों से भर गया।

वहाँ उपस्थित सभी श्रोता दंग रह गए। इन पुष्पों से अद्भुत सुगंध फैल गई। सब लोग सोचने लगे – यह किस वृक्ष के पुष्प हैं? ऐसे फूल उन्होंने जीवन में कभी नहीं देखे थे।

श्रोताओं में उपस्थित पंडित बाबा श्रीरामकृष्ण दास जी ने कहा –
“ये पुष्प साधारण नहीं हैं। देवताओं ने गौरांग दास जी की कथा से प्रसन्न होकर इन्हें अर्पित किया है। ये स्वर्ग के वृक्षों के पुष्प हैं।”

कुछ भक्त इन पुष्पों को घर भी ले गए। लेकिन आश्चर्य यह कि दो-तीन दिन बाद वे पुष्प अंतर्धान हो गए। न उनका कोई निशान रहा, न उनकी सुगंध। इससे सिद्ध हो गया कि वे फूल इस लोक के नहीं, स्वर्ग के ही थे।

उपसंहार

श्री गौरांग दास जी का जीवन दो महान सत्यों को उजागर करता है:

मानसी सेवा की महिमा – जब भक्त सच्चे भाव से मन में ठाकुर जी की सेवा करता है, तो वह सेवा भगवान के लिए उतनी ही वास्तविक हो जाती है, जितनी बाह्य सेवा।

सिद्ध संतों की महत्ता – सच्चे संतों की कथा केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं होती, अपितु देवता भी उनके श्रीमुख से भगवान की महिमा सुनने आते हैं।

इसलिए संत महापुरुषों की संगति और उनके चरणों में बैठकर कथा श्रवण करना हर भक्त का परम सौभाग्य है।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

 


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