श्री भक्तमाल – ३५: श्री हरेराम बाबा | Shri Bhaktmal Ji – 35

श्री भक्तमाल ३५ - श्री हरेराम बाबा Sri Hareram Baba

अलौकिक प्रेम और सिद्धियों से भरी संत-लीला


यह चरित्र श्री जगद्गुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज के श्रीमुख से सुना गया है। यह श्री हरेराम बाबा के अद्भुत जीवन की घटनाओं का वर्णन करता है, जो उनकी गहन भक्ति और सिद्धियों का प्रमाण हैं।

गोवर्धन में आगमन और परिक्रमा का नियम

श्री गणेशदास भक्तमाली जी गोवर्धन में लक्ष्मण मंदिर में निवास करते थे। वहाँ के पुजारी श्री रामचंद्रदास जी नित्य गिरिराज जी की परिक्रमा करने जाते थे। एक दिन, परिक्रमा के दौरान, उन्हें आन्यौर गाँव के पास लुकलुक दाऊजी नामक स्थान पर कुंज-लताओं में एक विलक्षण व्यक्ति दिखाई दिए। उनके नेत्रों से निरंतर अश्रु बह रहे थे, उनका पूरा शरीर ब्रजरज से लिपटा था, और मुख से झाग निकल रहा था। कुछ देर बाद उनका शरीर सामान्य हुआ, और वे महामंत्र का उच्चारण करने लगे:

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

पुजारी जी समझ गए कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि महान सिद्ध संत हैं। जब उन्होंने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने कहा कि लोग उन्हें प्रेम से हरेराम बाबा कहते हैं। पुजारी जी उन्हें लक्ष्मण मंदिर में श्री गणेशदास भक्तमाली जी के पास ले आए। धीरे-धीरे दोनों संतों में हरिचर्चा और प्रेम बढ़ गया, और श्री हरेराम बाबा भी उनके साथ रहने लगे।

श्री हरेराम बाबा ने बारह वर्षों तक केवल गिरिराज जी की परिक्रमा की। उनके पास लकड़ी के चार छोटे टुकड़े थे, जिन्हें वे करताल की तरह बजाते थे और इसी को बजा-बजाकर वे अहर्निश (दिन-रात) महामंत्र का जप करते हुए परिक्रमा करते थे। जब नींद आती, तो वे वहीं सो जाते और नींद खुलते ही फिर से परिक्रमा में लग जाते थे। नित्य वृंदावन की परिक्रमा करना और यमुना जल का पान करना, तथा यमुना जी में स्नान करना उनका नियम था। बाद में बाबा सुदामा कुटी में विराजमान हुए।

१. प्रेमावेश की दिव्य अवस्था

जब श्री हरेराम बाबा महामंत्र का कीर्तन करते, तो उन्हें प्रेमावेश होता और भगवान की साक्षात् अनुभूति होती थी। उन्हें एक नीलवर्ण (नीले रंग) की कांति (प्रकाश) दिखाई पड़ती, और उसी में श्रीकृष्ण के दर्शन होते। वे उस प्रकाश को पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे भागते और फिर कुछ देर बाद मूर्छित हो जाते। उनका शरीर काँपने लगता और कुछ समय बाद वे साधारण अवस्था में आ जाते।

एक बार श्री गणेशदास जी, पुजारी श्री रामचंद्रदास जी, और श्री हरेराम बाबा – ये तीनों संत पैदल जगन्नाथ पुरी के दर्शन के लिए निकले। रास्ते में कीर्तन करते हुए श्री हरेराम बाबा को प्रेमावेश हुआ और वे पास के एक गन्ने के सघन खेत को तीन मील तक चीरते हुए पार हो गए। उनका पूरा शरीर रक्त से भर गया और वे घंटों मूर्छित अवस्था में रहे। रास्ते में यह कई बार हुआ और बहुत दिनों के बाद वे संत जगन्नाथ पुरी पहुँचे।

२. भक्त भूरामल और उसकी पत्नी को वरदान

जयपुर में भूरामल बजाज नाम के एक व्यापारी थे, जो बाबा के शिष्य भी थे। एक बार उन्होंने अपने तीन मंजिला मकान की छत पर कीर्तन का आयोजन करवाया और बाबा को भी बुलाया। बाबा ने कहा कि छत पर कीर्तन करना ठीक नहीं है, क्योंकि पता नहीं कब प्रेमावेश आ जाए और लोगों को परेशानी हो। लेकिन भूरामल के आग्रह पर बाबा कीर्तन में बैठ गए।

कुछ देर बाद वे कीर्तन में इतने लीन हो गए कि नृत्य करते-करते वे दौड़ पड़े और छत से नीचे जा गिरे। सब लोग नीचे भागे और बाबा को उठाया। बाबा कुछ देर मूर्छित रहे और उनके एक हाथ में चोट लग गई। भूरामल को बहुत दुख हुआ कि उन्होंने बाबा की आज्ञा का उल्लंघन किया था। उन्होंने बाबा को अपने घर में रखकर लंबे समय तक उनकी सेवा की।

एक दिन श्री हरेराम बाबा प्रसन्न होकर बोले, “भूरामल बच्चा! मैं तुझ पर बहुत प्रसन्न हूँ, कुछ भी माँग ले।”

भूरामल ने कहा, “बाबा, मेरी यही इच्छा है कि मेरा शरीर भगवान का भजन करते हुए छूटे और मुझे भगवान के नित्य धाम की प्राप्ति हो।”

बाबा ने कहा, “ठीक है बच्चा, ऐसा ही होगा। तू अकेला ही नहीं, बल्कि तेरी पत्नी भी तेरे साथ भजन करते हुए भगवान के धाम को जाएगी।”

इस घटना के कुछ समय बाद, एक दिन बाबा श्री गणेशदास, पुजारी श्रीरामचंद्रदास जी और श्री हरेराम बाबा जयपुर के पास गलता आश्रम पर स्नान कर रहे थे। श्री हरेराम बाबा स्नान करके माला जपने लगे, तभी वे सहसा उठे और दोनों हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हुए बोले, “बहुत अच्छे भूरामल बच्चा! धाम को पधारो और ठाकुर जी को मेरी ओर से भी प्रणाम कर देना।”

दूसरे संतों ने पूछा कि वे आकाश की ओर देखकर किससे बात कर रहे थे। श्री हरेराम बाबा ने कहा कि “क्या तुमने देखा नहीं? भूरामल अपनी पत्नी के साथ विमान में बैठकर वैकुंठ जा रहा है। मैं उसी को आशीर्वाद देकर भगवान को प्रणाम करने को कह रहा था।” थोड़ी ही देर बाद भूरामल सेठ के घर से एक सेवक आया और उसने बताया कि अभी कुछ देर पहले ही भूरामल सेठ और उनकी पत्नी का भजन करते हुए शरीर छूट गया है।

३. एक चुड़ैल सहित प्रेतों का उद्धार

श्री हरेराम बाबा राजस्थान के पाली जिले के मुंडारा गाँव में एक खेत के पास झोंपड़ी बनाकर रहते थे। एक दिन गाँव के एक व्यक्ति के घर में प्रेतों का उपद्रव हो गया। सभी तांत्रिक, ओझा और पूजा-पाठ करने वाले हार गए, तो वह व्यक्ति अपना घर छोड़कर शहर जाने को तैयार हुआ। किसी ने उसे सुझाव दिया कि यदि श्री हरेराम बाबा उनके मकान में रह जाएँ, तो प्रेत भाग जाएंगे।

वह व्यक्ति बाबा के पास गया और उन्हें झूठ बोलकर अपने मकान में रहने का आग्रह किया। बाबा समझ गए कि वहाँ प्रेतों का वास है, फिर भी वे वहाँ रहने लगे। जैसे ही संध्या हुई, प्रेतों का उपद्रव शुरू हो गया। बाबा शांति से भजन में लगे रहे। प्रेतों ने नाच-गाना और शोर मचाया, पर बाबा अपने भजन से नहीं उठे।

अंत में एक चुड़ैल बाबा के सामने आकर खड़ी हो गई। बाबा उसे पहचानते थे। उन्होंने कहा, “अरे! तू तो इसी गाँव की थी और कुएँ में गिरकर मर गई थी। ब्राह्मण परिवार की बहू होने पर भी तुझे प्रेत योनि कैसे मिली?”

उसने बताया कि पर-पुरुष के संग के पाप से उसे प्रेत योनि मिली है। उसने आत्मग्लानि से कहा, “मैं इस प्रेत योनि में बहुत कष्ट पा रही हूँ, आप मेरा उद्धार कीजिए।”

बाबा ने पूछा कि यहाँ कितने प्रेत हैं। उसने बताया कि उनकी संख्या पंद्रह है। बाबा ने कहा कि वे इस पर विचार करेंगे। अगले दिन जब वह चुड़ैल फिर आई, तो बाबा ने विनोद में कहा, “बातों से उद्धार नहीं होता, उद्धार तो घी से होता है। हमारा घी समाप्त हो गया है।”

वह चुड़ैल तुरंत गाँव में एक यादव परिवार के मुखिया की बहू के शरीर में घुस गई। जब ओझा उसे भगाने आया, तो वह बोली कि यदि बाबा को गाय का घी दिया जाए, तो वह बहू को छोड़ देगी। मुखिया ने तुरंत तीन किलो गाय का घी बाबा के पास भिजवाया। जैसे ही घी पहुँचा, वह चुड़ैल उस बहू को छोड़कर वापस आ गई।

गाँव में यह बात फैल गई कि यदि बाबा को घी नहीं दिया तो वे भूत-प्रेत भेज देंगे। इसके बाद प्रतिदिन बाबा के यहाँ पाव भर ताजा घी आने लगा। कुछ दिनों बाद चुड़ैल ने फिर आकर कहा, “बाबा, अब हमारा उद्धार कीजिए।” बाबा ने कहा कि उद्धार कैसे होगा? तब उसने कहा कि यदि उनके लिए शिवपुराण की कथा हो, तो उनका उद्धार होगा। बाबा ने एक ब्राह्मण से गणेशदास भक्तमाली जी को पत्र लिखवाया।

श्री गणेशदास जी ने कभी शिवपुराण की कथा नहीं कही थी, पर बाबा की आज्ञा मानकर वे मथुरा से आए और कथा शुरू की। कथा के अंतिम दिन एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। सभी पंद्रह प्रेतों ने दिव्य शरीर धारण किया और बाबा को प्रणाम करके कहा, “बाबा, भगवान शिव के गणों का विमान आ गया है। हम लोग कैलाश को जा रहे हैं।”

४. संतों में श्रद्धा और भगवत्प्राप्ति का मार्ग

एक बार दिल्ली की एक स्त्री ने बाबा की लिखी हुई एक पुस्तक पढ़ी। उसने सोचा कि ऐसे संत के दर्शन अवश्य करने चाहिए। वह सुदामा कुटी पहुँची, जहाँ उस समय श्री राजेंद्रदास जी सेवा में रहते थे। उस स्त्री ने बाबा से मिलने की इच्छा जताई।

राजेंद्रदास जी ने बाबा से कहा कि एक भक्त दर्शन करने आई है। बाबा ने कहा कि वे किसी को अंदर न लाएँ, क्योंकि वे नग्न रहते हैं। राजेंद्रदास जी के आग्रह पर, बाबा मान गए। राजेंद्रदास जी ने बाबा के शरीर पर एक कपड़ा डाला और उस स्त्री को अंदर लाए। स्त्री ने प्रणाम किया और फल व ₹५१ की भेंट दी।

बाबा ने उससे उसके जीवन के बारे में पूछा। जब उसने बताया कि उसका विवाह नहीं हुआ है, तो बाबा ने विनोद में कहा, “मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मैं अब विवाह के योग्य नहीं हूँ।”

यह सुनकर वह स्त्री घबरा गई और नाराज होकर भागने लगी। जाते-जाते उसने अपनी सारी भेंट भी वापस कर दी। राजेंद्रदास जी ने बाबा से पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।

बाबा ने कहा, “विरक्त संतों के यहाँ अकेली महिलाओं का बार-बार आना ठीक नहीं है। मैं १०० साल से ऊपर का हूँ। इतने साल रामजी ने मुझे माया से बचाया, अब बुढ़ापे में मैं अपने वैराग्य पर कलंक नहीं लगा सकता।”

राजेंद्रदास जी ने पूछा, “यदि वह फिर भी वापस आए तो?” बाबा ने कहा, “अगली बार आएगी तो गाली दूँगा।” राजेंद्रदास जी ने पूछा, “गाली खाकर भी आ जाए तो?” यह सुनकर बाबा रोने लगे और कहा, “यदि उसकी ऐसी श्रद्धा है, तो फिर मैं उसे श्रीकृष्ण से मिलने का रास्ता बता दूँगा।”

५. महारास का दर्शन

एक बार अयोध्या में कनक भवन में महारास का आयोजन हुआ। श्री हरेराम बाबा, श्री गणेशदास भक्तमाली जी और कुछ अन्य संत वहाँ दर्शन करने गए। जैसे ही ठाकुर जी अंतर्ध्यान हुए, श्री हरेराम बाबा का शरीर निष्प्राण हो गया। उनकी साँसें रुक गईं और लोग उन्हें सरयू जी ले जाने लगे। लेकिन श्री गणेशदास जी ने उन्हें रोका और कहा कि जब तक उनके शरीर से दुर्गंध न आए, तब तक अंतिम संस्कार न करें।

अगले दिन, जब रासलीला पुनः आरंभ हुई और श्रीकृष्ण गोपियों के मध्य प्रकट हुए, तभी बाबा कूदकर खड़े हुए और “हे प्राणनाथ! हे गोविंद!” कहते हुए भगवान के चरणों को पकड़ लिया।

६. श्री द्वारिकलाल दुबे जी को आशीर्वाद

श्री हरेराम बाबा कुछ समय के लिए कोटा, राजस्थान में भी रहे। एक दिन वे चंबल नदी में स्नान करने गए। नदी को देखकर उन्हें यमुना जी का स्मरण हुआ और वे भाव-आवेश में आकर जल में कूद गए। लोग समझे कि वे डूब गए, और मछुआरों की मदद से उनका शरीर निकाला गया। जब चिता बनाकर अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही थी, तो उनके शिष्य श्री द्वारिकलाल दुबे जी को ध्यान में श्री रघुनाथ जी के दर्शन हुए।

भगवान ने उनसे कहा कि बाबा उनके नित्यधाम में आ गए हैं, पर उनका शरीर अभी कुछ समय धरती पर रहेगा, इसलिए वे जाकर उनके शरीर की रक्षा करें। द्वारिकलाल जी ने पुलिस की मदद से बाबा के शरीर को अपने घर ले आए और फूल बिछाकर उसे रख दिया। लगभग बारह घंटे बाद, बाबा महामंत्र का उच्चारण करते हुए उठकर बैठ गए।

द्वारिकलाल जी ने उनसे पूछा कि वे नित्यधाम कैसे चले गए। बाबा ने कहा कि ठाकुर जी के पार्षद उन्हें विमान में ले गए थे, पर भगवान ने कहा कि बाबा से धरती पर अभी बहुत काम करवाना है, इसलिए उन्हें वापस भेज दिया।

बाबा ने द्वारिकलाल जी से प्रसन्न होकर वरदान माँगने को कहा। द्वारिकलाल जी ने कहा कि उनकी इच्छा है कि वे भगवान के दर्शन और कीर्तन करते हुए अपने प्राण त्यागें। बाबा ने कहा, “ठीक है, ऐसा ही होगा।” बाद में जन्माष्टमी के समय, वे मथुरा के श्री मथुरेश जी के मंदिर में पैरों में घुंघरू बाँधकर कीर्तन करते हुए भगवान का दर्शन करते-करते परमधाम को सिधारे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।


Click here to download : Bhaktmal
Read More :

Narayanpedia पर आपको  सभी  देवी  देवताओ  की  नए  पुराने प्रसिद्ध  भजन और  कथाओं  के  Lyrics  मिलेंगे narayanpedia.com पर आप अपनी भाषा  में  Lyrics  पढ़  सकते  हो।